आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

रविवार, 26 दिसंबर 2010

मानव से महामानव बनने के लिए - जगत के मिथ्या होने का प्रतिपादन

पिछली पोस्ट में आपने जगत की भ्रमरूपता के विषय में पढ़ा की किस प्रकार यह संसार न होते हुए भी इन्द्रियों के द्वारा दृश्यमान होता है और अनुभव में आता है !
इस प्रकार एक स्वाभाविक प्रश्न स्वतः ही जन्म ले लेता है, की फिर यहाँ किया हुआ पाप पुण्य सब, अच्छा-बुरा, आत्मा परमात्मा सब भ्रमरूप ही हैं !
परन्तु संसार को मिथ्या समझने पर कर्म विहीनता और पलायन की स्थिति उत्तपन्न होगी, जो समाज के लिए हितकर नहीं !! भारतीय दर्शन पलायान का नहीं अपितु कर्म का दर्शन है, ऐसे में महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित शास्त्र और श्रीराम को भगवान् बनाने वाला संवाद भला पलायन की अनुमति कैसे दे सकता है !
श्री योगवाशिष्ठ - श्रीराम और उनके गुरु वशिष्ठ जी के बीच हुआ संवाद है ! उत्तपति प्रकरण में वैराग्य हेतु वशिष्ठ जी श्रीराम को जगत की भ्रमरूपता का विभिन्न उदाहरणों द्वारा ज्ञान करते हैं ! तो निर्वाण प्रकरण (जो ग्रन्थ का अंतिम प्रकरण है) में श्रीराम भी एक जिज्ञासु शिष्य की भांति स्वाभाविक ही उत्त्पन्न होने वाले प्रश्न पूछते हैं - 
हे गुरुदेव ! आप, मैं आदि जो यह प्रत्यक्ष दृश्य पदार्थ हैं, जो भूत आदिरूप से अनुभव में आते हैं, वह है ही नहीं, यह कैसे समझा जाए ?
भूत, भविष्य और वर्तमान काल में होने वाला जो यह जो संसार का दर्शन है, जिसका सबको अनुभव हो रहा है, इसके होते हुए आप यह कैसे कह रहें हैं कि यह जगत कभी उत्त्पन्न ही नहीं हुआ, इसलिए है ही नहीं !!!
इस पर मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी महाराज कहते हैं - 
हे रघुनंदन - जीव चेतन है, जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है, बस इतनी सी बात ही समझ में आ जाए, तो संसार के मिथ्या होने का सत्य समझ में आ जाएगा ! 
जीव (आत्मा) चिन्मय परब्रह्म का अंश है, इसलिए कित्रिम नहीं है ! किन्तु अज्ञान के कारण ही जीव चेत्य (जिसका कारण चेतन ही है) अर्थात दृश्यजगत की और उन्मुख हो गया है ! जीवन से अर्थात प्राण और कर्मेन्द्रियों को धारण करने से और चेतन अर्थात ज्ञानेन्द्रियों को धारण करने से वह जीव कहलाता है!
मैं ब्रह्म हूँ इस यथार्थ आत्मस्वरूप को भूलकर जीवात्मा जब यह देखने लगता है कि मैं मनुष्य आदि शारीर हूँ और यह पृथ्वी आदि मेरा आधार है, तब वह उसी में दृढ आस्था बाँध लेता है ! असत्य में सत्य बुद्धि करके ही जीव भावनावश बंध जाता है, अपने भीतर ही वह विभिन्न प्रकार की कल्पना करने लगता है, जो जिसमें आसक्त होगा उसे वही तो दिखेगा सो जीव भी अपने से भिन्न संसार में आसक्ति रखता है, इसलिए उसे संसार ही दिखता है !
जब जीव अपने वास्तविक स्वरुप को मानकर - जानकर, स्वयं संसार रूप हो जाएगा अर्थात समस्त भूतो में स्वयं को ही देखेगा, स्वयं को ही सभी कार्यों का कारण मान लेगा तो, वह निस्वार्थ कर्म करेगा और उसका कर्म समाज के लिए अति हितकर हो जाएगा !
जगत को मिथ्या मानने का अर्थ यह नहीं है कि जगत को छोड़ दिया जाए, बल्कि इसका अर्थ तो यह है कि सम्पूर्ण विश्व को अपना लिया जाए ! 
यदि स्वामी रामदेव के शब्दों में कहा जाए तो - यहाँ कुछ छोड़ना नहीं है, वस्तुतः सूक्ष्म वस्तु को छोड़ कर विराट वस्तु  को अपना लेना है ! मानव से महा - मानव बनने के लिए व्यष्टि को छोड़ समष्टि को अपना लेना है !!!!!!!!!!

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

शंकराचार्य - भारतीय पौराणिक ऐतिहासिक महापुरूष - सूक्ष्म परिचय श्रृंखला

भारतीय पौराणिक ऐतिहासिक महापुरूष - सूक्ष्म परिचय श्रृंखला
भारत के महान दार्शनिकों और धर्मरक्षकों  में स्वामी शंकराचार्य जी का नाम अग्रणीय है !
उनका जन्म केरल के कालडी ग्राम में शिवगुरु नम्बूदरी और आर्याम्बा के घर हुआ !!
उनके जन्म के समय के बारे में अभी भी कुछ अधिक स्पष्ट नहीं है, विद्वानों के अनुसार उनका जन्म ८ वीं शताब्दी में हुआ, जबकि दयानंद जी का मानना है की उनका जन्म आज से २१०० से २२०० वर्ष पूर्व हुआ !
वे जन्म से ही महामेधावी थे, बचपन में ही उन्होंने संन्यास ग्रहण किया ! उपनिषदों और वेदांत ग्रंथो के महान भाष्यकार और अद्वैत वेदांत दर्शन प्रणेता, दिग्विजयी वैदिक मतोद्धारक, जिन्होंने अल्प जीवन (निधन ३२ वर्ष की आयु में
) में ही चमत्कारिक ढंग से पूरे भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ दिया और राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने के लिए स्थायी आधार हमारे लिए बना गए !!!

बुधवार, 24 नवंबर 2010

खैर चिंता छोडिये - प्रतुल जी

प्रतुल जी बकरे की आत्मकथा ऊपरवाले से प्यार करने वालों के लिए है -
क्योंकि जिससे हम प्यार करते हैं उसकी सृजित हर वस्तु हमें प्यारी होती है - कम से कम चटोरेपन के लिए तो हम उसकी सृजित वस्तु को नष्ट नहीं कर सकते ---

उनको क्या ? जिनमें संवेदना ही शून्य हो चुकी है -
उनको क्या ? जो उस परमात्मा को एक व्यक्तित्व समझते हैं, जो मूर्ख मनुष्यों की भांति इच्छा पूरी होने प्रसन्न होता हैं और इच्छा पूरी न होने पर खिन्न होता है, जो ईर्ष्यालु है ! 

खैर चिंता छोडिये !!! हम, आप और वो बकरा बेचारा और उसके अन्य  चौपाये, दोपाये साथी आखिर भारत जैसे गरीब देश में पैदा हुए हैं - 
जी. डी. पी. में आखिर मांस व्यापार और चमडा व्यापार 

सोमवार, 22 नवंबर 2010

ब्लॉग युद्ध - अमित बनाम अनवर जमाल


ये ब्लॉग युद्ध लड़ा जा रहा  है उस देश में जहाँ 45 लाख का एक बकरा बिकता है, बकरों का 3-4 लाख में बिकना भी यहाँ कोई बड़ी बात नहीं है, ध्यान दीजिये उस देश में जहाँ आज भी हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है !
पात्र परिचय -
हिंदी ब्लॉग एक आसमान पर चमकते हुए एक सितारे का नाम है डा. अनवर जमाल !
नाम तो आप सभी को पता ही होगा और काम भी पता होगा !
उन्होंने हिन्दुओं को उनकी धार्मिक कुरूतियों से अवगत कराने के लिए और इस्लाम की सार्थकता जताने के लिए एक ब्लॉग शुरू किया वेद-कुरान, ब्लॉग काफी उन्नत है, मैं भी उसका और उनका मुरीद हूँ ! आखिर अदा ही साहब की कुछ ऐसी है, रोज १०-२० लोग उनकी तारीफ करने के लिए उनके ब्लॉग पर आते हैं तो कुछ गलियां देने के लिए !!!

रविवार, 21 नवंबर 2010

जगत की भ्रमरूपता


यह जगत संकल्प के निर्माण, मनोराज्य के विलास, इंद्रजाल द्वारा रचित पुष्पहार, कथा-कहानी के अर्थ के प्रतिभास, वातरोग के कारण प्रतीत होने वाले भूकंप, बालक को डराने के लिए कल्पित पिशाच, निर्मल आकाश में कल्पित मोतियों के ढेर, नाव के चलने से तथा प्रतीत होनेवाली वृक्षों की गति, स्वप्न में देखे गए नगर, अन्यत्र देखे गए फूलों के स्मरण से आकाश से आकाश में कल्पित हुए पुष्प की भांति भ्रम द्वारा निर्मित हुआ है !

मृत्युकाल में पुरुष स्वयं अपने हृदय में इसका अनुभव करता है ! (यहाँ मृत्यु से अभिप्राय शरीरांत नहीं है) 
इस प्रकार जगत मिथ्या होने पर भी चिरकाल तक अत्यंत परिचय में आने के कारण घनिभाव(दृढ़ता) को प्राप्त होकर जीव के हृदयाकाश में प्रकाशित हो बढ़ने लगता है ! यह क्षेत्र इहलोक कहलाता है ! जन्म से लेकर मृत्यु तक की चेष्टाओं तथा मरण आदि का अनुभव करने वाला जीव वहीँ (हृदयाकाश में ही) इहलोक की कल्पना करता है, जिसको पहले भी बताया गया है ! फिर मरने (शरीर का अंत) के अनन्तर वह वहीँ परलोक की कल्पना करता है ! 
वासना के भीतर अन्य अनेक शरीर और उनके भीतर भी दूसरे-दूसरे, भिन्न-भिन्न शरीर - 
--- ये इस संसार में केले के वृक्ष की त्वचा (छिलके या वल्कल) के सामान एक के पीछे एक प्रतीत होते हैं ! 
न तो पृथ्वी आदि पञ्च-महाभूतों के समुदाय हैं और न जगत की सृष्टि का कोई क्रम ही है ! यह विभिन्न रूप दिखने वाले सब के सब मिथ्या हैं ! तथापि मृत और जीवित जीवों को इनमे संसार का भ्रम होता है ! यह अविद्या विभिन्न धाराओं में फैलती है ! मूढ़ पुरूष के लिए यह इतनी विशाल है की, वे इसे पार नहीं कर सकते ! सृष्टिरुपी चंचल तरंगो से ही यह अविद्या तरंगवती जान पड़ती है और संसार यथावत जान पड़ता है !

जबकि सच तो इतना ही है - यहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नाही
                                                                                
                                                          श्री योगवाशिष्ठ महारामायण 

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई ... (2)
जहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नाही .... (2)

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई ... (2)

पता जब लगा मेरी हस्ती का मुझको ....
पता जब लगा मेरी ..
पता जब लगा मेरी हस्ती का मुझको...(2)
सिवा मेरे अपने कहीं कुछ नाही ....(2)
मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आ ..आ ...आई ..(2)

सभी में सभी में पड़ा मैं ही मैं हूँ ...(3)
सिवा मेरे अपने कहीं कुछ नाही....(2)


मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आ ..आ ...आई ...(2)
मुझे मेरी मस्ती ....

न दुःख है न सुख है, ना है शोक  कुछ भी .....
अजब है ये मस्ती (2) या कुछ नाही ..

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई ...(4)

ये सागर ये लहरें ये फेन ये बुदबुदे ..... (2)
कल्पित है (2) जल के सिवा कुछ नाही ...(2)

मुझे मेरी मस्ती कहा लेके आई ...(4)
मैं हूँ आनंद, आनंद हैं ये मेरा ......
भ्रम है, ये द्वन्द है, मुझाको हुआ  है ...(2)
हटाया जो उसको खफा कुछ नाही ,,,,,

मुझे मेरी मस्ती कहा लेके आई ...(4)

ये पर्दा है दुई का,हटा कर जो देखा ... (2)
तो बस एक मैं हूँ .... (3), जुदा कुछ नाही ...

मुझे मेरी मस्ती कहा लेके आई ...(4)


mujhe meri masti kaha leke aayi by narayan swami

नारायण स्वामी की आवाज में ये भजन   <<<<<<  DOWNLOAD >>>>>>

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

जानने योग्य कौन है ?


जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है, न बाहर की ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है, न जानने वाला है, न नहीं जानने वाला है, जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहार में नहीं आ सकता है, जो पकड़ने में नहीं आ सकता है, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्नतन करनेमें नहीं आ सकता, जो बतलाने में नहीं आ सकता, एकमात्र आत्मा की प्रतीति ही जिसका सार है, जिसमें प्रपंच का सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शांत, कल्याणमय, अद्वितीय, तत्व परब्रह्म परमात्मा का चतुर्थ पाद (पैर अथवा अंग) है, इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी मानते हैं ! वह परमात्मा है, वह जानने योग्य है, केवल वही जानने योग्य है !

ॐ शांति: शांति: शांति: !!!

मांडूक्योपनिषद (७)

यदि देशभक्ति पाप है तो, मैं जानता हूँ...

यदि देशभक्ति पाप है तो  मैं  जानता हूँ, मैंने पाप किया है ! यदि प्रशंसनीय है तो मैं अपने आपको उस प्रशंसा का अधिकारी समझता हूँ ! मुझे विश्वास है की मनुष्यों के द्वारा स्थापित न्यायालय के ऊपर कोई न्यायायल हो तो उसमें मेरे काम को अपराध नहीं समझा जाएगा ! मैंने देश और जाति की भलाई के लिए यह काम किया ! मैंने उस व्यक्ति पर गोली चली जिसकी नीतियों के कारण हिन्दुओं पर घोर संकट आये और हिन्दू नष्ट हुए !!

         नथुराम गोडसे

रविवार, 3 अक्तूबर 2010

सत्य के प्रयोग (आत्मकथा)

मैं चाहता हूँ कि मुझे यह प्रकरण न लिखना पड़ता । लेकिन इस कथा में मुझको ऐसे कितने कड़वे घूंट पीने पड़ेंगे । सत्य का पुजारी होने का दावा कर के मैं और कुछ कर ही नहीं सकता । यह लिखते हुए मन अकुलाता हैं कि तेरह साल की उमर में मेरा विवाह हुआ था । आज मेरी आँखो के सामने बारह-तेरह वर्ष के बालक मौजूद हैं। उन्हें देखता हूँ और अपने विवाह का स्मरण करता हूँ तो मुझे अपने ऊपर दया आती हैं और इन बालकों को मेरी स्थिति से बचने के लिए बधाई देने की इच्छा होती हैं । तेरहवें वर्ष में हुए अपने विवाह के समर्थन में मुझे एक भी नैतिक दलील सूझ नहीं सकती । ---------------------................................
पुस्तक डाउनलोड करें महात्मा गाँधी की आत्मकथा
वह पहली रात ! दो निर्दोष बालक अनजाने संसार-सागर में कूद पड़े । भाभी ने सिखलाया कि मुझे पहली रात में कैसा बरताब करना चाहिये । धर्मपत्नी को किसने सिखलाया, सो पूछने की बात मुझे याद नहीं ।

रविवार, 12 सितंबर 2010

स्वामी विवेकानंद की आदर्श राज्य की परिकल्पना

स्वामीजी ने वर्ण व्यवस्था का ऐतिहासिक विश्लेषण करते हुए कहा था कि मानव समाज में चारों वर्ण - ब्राह्मण अथवा पुरोहित वर्ग, क्षत्रिय अथवा सैनिक वर्ग, वैश्य अथवा व्यापारी वर्ग तथा शूद्र अथवा सेवक वर्ग बारी-बारी से राज्य करते हैं! प्रत्येक वर्ण के राज्य के अपने-अपने गुण तथा दोष होते हैं!

ब्राह्मण वर्ण के राज्य के अंतर्गत जन्म के आधार पर समाज में भयंकर पृथकता रहती है! ब्राह्मणों अथवा पुरोहितो का वर्ग विशेषाधिकारों से सुरक्षित रहता है!
शिक्षा पर ब्राह्मण वर्ण का नियंत्रण हो जाता है! समाज को शिक्षा देने का उसका अधिकार सुरक्षित रहता है! अतः समाज के अन्य वर्ग ज्ञान से वंचित रह जाते हैं! इस काल में विभिन्न प्रकार की विद्याओं तथा कलाओं की नींव पड़ती है!


इसके पश्चात क्षत्रिय राज्य आता है जो क्रूर, निरंकुश तथा अन्यायी होता है! ऐसे राज्य में पृथकता नहीं होती है, परन्तु कलाएं और सभ्यता उन्नति के चरमशिखर पर पहुँच जाती हैं!

इसके पश्चात वैश्य-राज्य आता है, इस राज्य में शोषण तथा खून-चूसने कि प्रवृति पनपती है! व्यापार तथा कारोबार फलता-फूलता है! प्रकृति का भी अत्यधिक शोषण होता है! व्यापारी वर्ग ब्राह्मण तथा क्षत्रिय राज्य में उपलब्धियों तथा विचारों का प्रसार करता है! वैश्य राज्य में क्षत्रिय राज्य से कम पृथकता होती है, परन्तु सभ्यता कि अवनति आरम्भ हो जाती है!

रविवार, 5 सितंबर 2010

मनुष्य शरीर ही ब्रह्माण्ड है

महासर्ग के आदि में जगत की रचना करने वाले परम पुरुष परमेश्वर ने विचार किया की मैं जिस ब्रह्माण्ड की रचना करना चाहता हूँ, उसमें एक ऐसा कौन-सा तत्व डाला जाय की जिसके रहने पर मैं स्वयं भी उसमें रह सकूं अर्थात मेरी सत्ता स्पष्ट रूप से व्यक्त रहे और जिसके रहने पर मेरी सत्ता स्पष्ट रूप से प्रतीत होती रहे ! परब्रह्म परमेश्वर ने सर्वप्रथम सबके प्राणरूप सर्वात्मा हिरण्यगर्भ को बनाया ! उसके बाद शुभ कर्म में प्रवृत करने वाली श्रद्धा अर्थात आस्तिक बुद्धि को प्रकट करके फिर क्रमश: शारीर के उपादान भूत - आकाश, वायु, तेज, जल, और पृथ्वी - इन पांच महाभूतों की सृष्टि की ! इन पांच महाभूतों के बाद परमेश्वर ने - मन, बुद्धि, चित्त, और अंहकार- इन चारों के समुदायरूप अन्त:करण को रचा ! फिर विषयों के ज्ञान और कर्म के लिए पांच ज्ञानेन्द्रियों तथा पांच कर्मेन्द्रियों को उत्पन्न किया, फिर प्राणियों के शरीर की स्थिति के लिए अन्न की और अन्न की और अन्न के परिपाक द्वारा बल की सृष्टि की ! उसके बाद अन्त:करण के संयोग से इन्द्रियों द्वारा किये जाने वाले कर्मों का निर्माण किया ! उनके भिन्न-भिन्न फलरूप लोकों को बनाया और उन सबके नामों की रचना की ! इस प्रकार सोलह कलाओं से युक्त इस ब्रह्माण्ड की रचना करके जीवात्मा के सहित परमेश्वर स्वयं इसमें प्रविष्ट हो गए; इसीलिए वे सोलह कलाओं वाले पुरुष कहलाते हैं ! हमारा यह मनुष्य शरीर भी ब्रह्माण्ड का ही एक छोटा सा नमूना है, अत: जिस प्रकार परमेश्वर इस सारे ब्रह्माण्ड में हैं, उसी प्रकार हमारे इस शरीर में भी हैं और इस शरीर में भी वह सोलह कलाएं वर्तमान में विद्यमान हैं !
उन हृदयस्थ परमदेव पुरुषोत्तम जान लेने से ही इस सम्पूर्ण सृष्टि का ब्रह्माण्ड का और उस महान सत्य को को जाना जा सकता है, इसके इसके अतिरिक्त और कोई भी साधन नहीं है !

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

सृष्टि की उत्त्पत्ति का सत्य


वैज्ञानिकों से लेकर साधारण मानव तक सभी यह जानना चाहतें है की सृष्टि की उत्त्पत्ति कैसे हुई, कब और क्यों हुई, परन्तु वैज्ञानिक आंकड़ों और संभावनाओं में उलझे हुए हैं, और धर्माधिकारी अपने-अपने धर्म के अनुसार सृष्टि की उत्त्पत्ति की विवेचना करते हैं, और साधारण आदमी के पास इतना समय ही नहीं है कि वो पदार्थ जगत की कल्पना को छोड़ कर इन जटिल विषयों की और ध्यान लगाये !
सृष्टि की उत्त्पत्ति के विषय में विज्ञान अभी भी अपूर्ण ज्ञान रखता है, यदि धर्मों की बात की जाए तो इस्लाम और ईसाईयत में सृष्टि की उत्त्पत्ति को परमेश्वर की छः दिनों का कार्य बताया गया है और सातवें दिन परमेश्वर के आराम का दिन कहा गया है ! इन धर्मों में सृष्टि रचना का जो क्रम विवरित है वो भी कहीं से तर्कपूर्ण और वैज्ञानिक नहीं जान पड़ता है !


सृष्टि की उत्त्पत्ति के विषय में वैदिक ज्ञान अधिक वैज्ञानिक और प्रासंगिक जान पड़ता है ! आइये जाने सृष्टि की उत्त्पत्ति का सत्य उपनिषदों की दृष्टि से :-

सृष्टि के आरम्भ में एकमात्र 'आत्मा' का विराट ज्योतिर्मय स्वरूप विद्यमान था ! तब उस आत्मा ने विचार किया कि सृष्टि का सृजन किया जाये और विभिन्न लोक बनाये जायें तथा उनके लोकपाल निश्चित किये जायें ! ऐसा विचार कर आत्मा ने अम्भ, मरीचि, मर और आप लोकों की रचना की। द्युलोक से परे स्वर्ग की प्रतिष्ठा रखने वाले लोक को 'अम्भ' कहा गया। मरीचि को अन्तरिक्ष, अर्थात प्रकाश लोक (द्युलोक) कहा गया, पृथिवी लोक को मर, अर्थात मृत्युलोक नाम दिया गया, पृथिवी के नीचे जलीय गर्भ को पाताललोक (आप:) कहा गया!


लोकों की रचना करने के उपरान्त परमात्मा ने लोकपालों का सृजन करने की इच्छा से आप: (जलीय गर्भ) से 'हिरण्य पुरुष' का सृजन किया! सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ से अण्डे के रूप का एक मुख प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्री, वाक् इन्द्री से 'अग्नि' उत्पन्न हुई ! तदुपरान्त नाक के छिद्र प्रकट हुए। नाक के छिद्रों से 'प्राण' और प्राण से 'वायु' उत्पन्न हुई। फिर नेत्र उत्पन्न हुए! नेत्रों से चक्षु (देखने की शक्ति) प्रकट हुए और चक्षु से आदित्य प्रकट हुआ। फिर त्वचा, त्वचा से 'रोम' और रोमों से वनस्पति-रूप 'औषधियां' प्रकट हुईं। उसके बाद 'हृदय', हृदय से 'मन, 'मन से 'चन्द्र' उदित हुआ। तदुपरान्त नाभि, नाभि से 'अपान' और अपान से 'मृत्यु' का प्रादुर्भाव हुआ। फिर 'जननेन्द्रिय, 'जननेन्द्रिय से 'वीर्य' और वीर्य से 'आप:' (जल या सृजनशीलता) की उत्पत्ति हुई !

(ऐतरेय उपनिषद से संकलित)

क्रमश
: ..............................................

शनिवार, 14 अगस्त 2010

बेटा ! अपनी माँ को माँ कहो - माँ को बेटे से मिलाते हिंदी ब्लोगर्स

बेटा !!! अपनी माँ को माँ कहो - यह शब्द सुनने में कितना अजीब लगेगा जब कि कोई बच्चा जो अपनी माँ को अच्छी तरह जानता हो, उससे ऐसा कहा जाए ! परन्तु आज वास्तविकता तो कुछ ऐसी ही है !

हिंदी भारत की राजभाषा है, आपको मानना भी पड़ेगा कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा है, हकीकत से कोसों दूर ! ऐसा इसलिए है कि राष्ट्रभाषा के पहचान के प्रति देशावाशी उदासीन हैं ! इसके अधिकाधिक प्रयोग के लिए भी प्रचार-प्रसार किये जा रहें हैं ! पर यह कुछ अजीब सा लगता है कि जो हमारी अपनी उसे अपनाने के लिए कहने की आवश्यकता है ! अब तो आप ( बेटा ! अपनी माँ को माँ कहो ) का यथार्थ समझ ही चुके होंगें !

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना जैसी पार्टियों ने स्वार्थ के वशीभूत होकर हद ही पर कर दी और माँ को माँ मानने से भी इनकार कर दिया ! वो तो भला हो हिंदी ब्लॉग लेखकों और पाठकों का जिनके कारण आज कई बेटे अपनी मातृभाषा ( माँ ) के करीब हैं, यदि दूर दृष्टि डाली जाए तो हिंदी को इस मकडजाल पर स्थापित करने का श्रेय हिंदी ब्लोगर्स का ही है ! भारत में सर्वप्रथम < वेबदुनिया > से हिंदी वेब लेखन की शुरुआत हुई जिसे आज हिंदी ब्लोगर्स ने संतोषजनक स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया है !

सोमवार, 26 जुलाई 2010

रंगरंगीली, छैलछबीली. तितलीनुमा परियों से कभी राष्ट्र का नव निर्माण न हो सकेगा


राजर्षि जनक की महती सभा में ब्रह्मा ज्ञान की चर्चा हो रही थी ! जनक ने घोषणा कि जो विद्वान अपने आप को ब्रह्मज्ञानी समझता हो वह बाहर खड़ी हुई रत्नाजडित १ लाख गौओं को हांक ले जाए ! विख्यात मुनि याज्ञवल्क्य उठे और अपने शिष्य से बोले- बाहर खड़ी गौओं को आश्रम ले चलो ! याज्ञवल्क्य की वाणी से सभा में सन्नाटा छा गया, ऐसा लगा जैसे और कोई ब्रह्मज्ञानी वहां है ही नहीं, परन्तु उसी समय गार्गी खड़ी हो गई और मुनि से ब्रह्मज्ञानी होने का प्रमाण माँगा और मुनि के सम्मुख ब्रह्म के प्रश्नों की झड़ी लगा दी, मुनि कुछ देर तक तो जबाब देते रहें, परन्तु अंत: उन्होंने कहा की ब्रह्म अनंत है और उसका ज्ञान भी अनंत है इसलिए गार्गी तू और प्रश्न ना पूछ !
तू भी ब्रह्मज्ञानी है - इसमें कोई नहीं संदेह है !!!
यह है वैदिक नारी की एक भव्यतम झांकी 

और आज की भारतीय नारी को आरक्षण की बैशाखी का सहारा

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

उपनिषद् और ॐ की पूर्ण व्याख्या




वेदशब्द का अर्थ ज्ञान है। वेद-पुरुष के शिरोभाग को उपनिषद् कहते हैं। उप (व्यवधानरहित) नि (सम्पूर्ण) षद् (ज्ञान)। किसी विषय के होने न होने का निर्णय ज्ञान से ही होता है। अज्ञान का अनुभव भी ज्ञान ही कराता है। अतः ज्ञान को प्रमाणित करने के लिए ज्ञान से भिन्न किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। उपनिषद् का अन्य अर्थ उप(समीप) निषत् -निषीदति-बैठनेवाला। अर्थात- जो उस परम तत्व के समीप बैठता हो। उपनिषद्यते-प्राप्यते ब्रह्मात्मभावोऽनया इति उपनिषद् ।अर्थात्-जिससे ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सके,वह उपनिषद् है।
मुक्तिकोपनिषद् में एक सौ आठ (१०८) उपनिषदों का वर्णन आता है, इसके अतिरिक्त अडियार लाइब्रेरी मद्रास से प्रकाशित संग्रह में से १७९ उपनिषदों के प्रकाशन हो चुके है। गुजराती प्रिटिंग प्रेस बम्बई से मुदित उपनिषद्-वाक्य-महाकोष में २२३ उपनिषदों की नामावली दी गई है, इनमें उपनिषद(१) उपनिधि-त्स्तुति तथा (२)देव्युपनिषद नं-२ की चर्चा शिवरहस्य नामक ग्रंथ में है लेकिन ये दोनों उपलब्ध नहीं हैं तथा माण्डूक्यकारिका के चार प्रकरण चार जगह गिने गए है इस प्रकार अबतक ज्ञात उपनिषदो की संख्या २२० आती हैः-
कुल ज्ञात उपनिषद मुख्य १०८ उपनिषद्

१-ईशावास्योपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय)
२-अक्षिमालिकौपनिषद् (ऋग्वेदीय)
३-अथर्वशिखोपनिषद् (सामवेद)
४-अथर्वशिर उपनिषद् (सामवेद)
५-अद्वयतारकोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
६अद्वैतोपनिषद्
७-अद्वैतभावनोपनिषद्
८-अध्यात्मोपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय) ९-अनुभवसारोपनिषद्
१०-अन्नपुर्णोंपनिषद् (सामवेद)
११-अमनस्कोपनिषद्
१२-अमृतनादोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१३-अमृतबिन्दूपनिषद्(ब्रह्मबिन्दूपनिषद्) (कृष्णयजुर्वेदीय)
१४-अरुणोपनिषद्
१५अल्लोपनिषद
१६-अवधूतोपनिषद्(वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक) (कृष्णयजुर्वेदीय)
१७-अवधूतोपनिषद्(पद्यात्मक)
१८-अव्यक्तोपनिषद् (सामवेद)
१९-आचमनोपनिषद्
२०-आत्मपूजोपनिषद्
२१-आत्मप्रबोधनोपनिषद्(आत्मबोधोपनिषद्) (ऋग्वेदीय)
२२-आत्मोपनिषद्(वाक्यात्मक) (सामवेद)
२३-आत्मोपनिषद्(पद्यात्मक)
२४-आथर्वणद्वितीयोपनिषद्
२५-आयुर्वेदोपनिषद्
२६-आरुणिकोपनिषद्(आरुणेय्युपनिषद्) (सामवेद)
२७-आर्षेयोपनिषद्
२८-आश्रमोपनिषद्
२९-इतिहासोपनिषद्(वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक)
३०-ईसावास्योपनिषद
उपनषत्स्तुति(शिव रहस्यान्तर्गत,अबी तक अनुपलब्ध है।)
३१-ऊध्वर्पण्ड्रोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक)
३२-एकाक्षरोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
३३-ऐतेरेयोपनिषद्(अध्यायात्मक) (ऋग्वेदीय)
३४-ऐतेरेयोपनिषद्(खन्ड़ात्मक)
३५-ऐतेरेयोपनिषद्(अध्यायात्मक)
३६-कठरुद्रोपनिषद्(कण्ठोपनिषद्) (कृष्णयजुर्वेदीय)
३७-कठोपनिषद्
३८-कठश्रुत्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
३९-कलिसन्तरणोपनिषद्(हरिनामोपनिषद्) (कृष्णयजुर्वेदीय)
४०-कात्यायनोपनिषद्
४१-कामराजकीलितोद्धारोपनिषद्
४२-कालाग्निरुद्रोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
४३-कालिकोपनिषद्
४४-कालिमेधादीक्षितोपनिषद्
४५-कुण्डिकोपनिषद् (सामवेद)
४६-कृष्णोपनिषद् (सामवेद)
४७-केनोपनिषद् (सामवेद )
४८-कैवल्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
४९-कौलोपनिषद्
५०-कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
५१-क्षुरिकोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
५२-गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद् (सामवेद)
५३-गणेशपूर्वतापिन्युपनिषद्(वरदपूर्वतापिन्युपनिषद्)
५४-गणेशोत्तरतापिन्युपनिषद्(वरदोत्तरतापिन्युपनिषद्)
५५-गर्भोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
५६-गान्धर्वोपनिषद्
५७-गायत्र्युपनिषद्
५८-गायत्रीरहस्योपनिषद्
५९-गारुड़ोपनिषद्(वाक्यात्मक एवं मन्त्रात्मक) (सामवेद)
६०गुह्यकाल्युपनिषद्
६१-गुह्यषोढ़ान्यासोपनिषद्
६२-गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् (सामवेद)
६३-गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद्
६४-गोपीचन्दनोपनिषद्
६५-चतुर्वेदोपनिषद्
६६-चाक्षुषोपनिषद्(चक्षरुपनिषद्,चक्षुरोगोपनिषद्,नेत्रोपनिषद्)
६७-चित्त्युपनिषद्
६८-छागलेयोपनिषद्
६९-छान्दोग्योपनिषद् (सामवेद)
७०जाबालदर्शनोपनिषद् (सामवेद)
७१-जाबालोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
७२-जाबाल्युपनिषद् (सामवेद)
७३-तारसारोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
७४-तारोपनिषद्
७५-तुरीयातीतोपनिषद्(तीतावधूतो०) (शुक्लयजुर्वेदीय)
७६-तुरीयोपनिषद्
७७-तुलस्युपनिषद्
७८-तेजोबिन्दुपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
७९-तैत्तरीयोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
८०-त्रिपादविभूतिमहानारायणोपनिषद् (सामवेद)
८१-त्रिपुरातापिन्युपनिषद् (सामवेद)
८२-त्रिपुरोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
८३-त्रिपुरामहोपनिषद्
८४-त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
८५-त्रिसुपर्णोपनिषद्
८६-दक्षिणामूर्त्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
८७-दत्तात्रेयोपनिषद् (सामवेद)
८८-दत्तोपनिषद्
८९-दुर्वासोपनिषद्
९०-(१) देव्युपनिषद्(पद्यात्मक एवं मन्त्रात्मक) (सामवेद)
(२) देव्युपनिषद्(शिवरहस्यान्तर्गत-अनुपलब्ध)
९१-द्वयोपनिषद्
९२-ध्यानबिन्दुपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
९३-नादबिन्दुपनिषद् (ऋग्वेदीय)
९४-नारदपरिब्राजकोपनिषद् (सामवेद)
९५-नारदोपनिषद्
९६-नारायणपूर्वतापिन्युपनिषद्
९७-नारायणोत्तरतापिन्युपनिषद्
९८-नारायणोपनिषद्(नारायणाथर्वशीर्ष) (कृष्णयजुर्वेदीय)
९९-निरालम्बोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
१००-निरुक्तोपनिषद्
१०१-निर्वाणोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
१०२-नीलरुद्रोपनिषद्
१०३-नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद्
१०४-नृसिंहषटचक्रोपनिषद्
१०५-नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद् (सामवेद)
१०६-पञ्चब्रह्मोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१०७-परब्रह्मोपनिषद् (सामवेद)
१०८-परमहंसपरिब्राजकोपनिषद् (सामवेद)
१०९-परमहंसोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
११०-पारमात्मिकोपनिषद्
१११-पारायणोपनिषद्
११२-पाशुपतब्राह्मोपनिषद् (सामवेद)
११३-पिण्डोपनिषद्
११४-पीताम्बरोपनिषद्
११५-पुरुषसूक्तोपनिषद्
११६-पैङ्गलोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
११७-प्रणवोपनिषद्(पद्यात्मक)
११८-प्रणवोपनिषद्(वाक्यात्मक
११९-प्रश्नोपनिषद् (सामवेद)
१२०-प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१२१-बटुकोपनिषद(बटुकोपनिषध)
१२२-ब्रह्वृचोपोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
१२३-बाष्कलमन्त्रोपनिषद्
१२४-बिल्वोपनिषद्(पद्यात्मक)
१२५-बिल्वोपनिषद्(वाक्यात्मक)
१२६-बृहज्जाबालोपनिषद् (सामवेद)
१२७-बृहदारण्यकोपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय)
१२८-ब्रह्मविद्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१२९-ब्रह्मोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१३०-भगवद्गीतोपनिषद्
१३१-भवसंतरणोपनिषद्
१३२-भस्मजाबालोपनिषद् (सामवेद)
१३३-भावनोपनिषद्(कापिलोपनिषद्) (सामवेद)
१३४-भिक्षुकोपनिष (शुक्लयजुर्वेदीय)
१३५-मठाम्नयोपनिषद्
१३६-मण्डलब्राह्मणोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
१३७-मन्त्रिकोपनिषद्(चूलिकोपनिषद्) (शुक्लयजुर्वेदीय)
१३८-मल्लायुपनिषद्
१३९-महानारायणोपनिषद्(बृहन्नारायणोपनिषद्,उत्तरनारायणोपनिषद्)
१४०-महावाक्योपनिषद्
१४१-महोपनिषद् (सामवेद)
१४२-माण्डूक्योपनिषद् (सामवेद)
१४३-माण्डुक्योपनिषत्कारिका
(क)-आगम
(ख)-अलातशान्ति
(ग)-वैतथ्य
(घ)-अद्वैत
१४४-मुक्तिकोपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय)
१४५-मुण्डकोपनिषद् (सामवेद)
१४६-मुद्गलोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
१४७-मृत्युलाङ्गूलोपनिषद्
१४८-मैत्रायण्युपनिषद् (सामवेद)
१४९-मैत्रेव्युपनिषद् (सामवेद)
१५०-यज्ञोपवीतोपनिषद्
१५१-याज्ञवल्क्योपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
१५२-योगकुण्डल्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१५३-योगचूडामण्युपनिषद् (सामवेद)
१५४-(१) योगतत्त्वोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१५५-(२) योगतत्त्वोपनिषद्
१५६-योगराजोपनिषद्
१५७-योगशिखोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१५८-योगोपनिषद्
१५९-राजश्यामलारहस्योपनिषद्
१६०-राधोकोपनिषद्(वाक्यात्मक)
१६१-राधोकोपनिषद्(प्रपठात्मक)
१६२-रामपूर्वतापिन्युपनिषद् (सामवेद)
१६३-रामरहस्योपनिषद् (सामवेद)
१६४-रामोत्तरतापिन्युपनिषद्
१६५-रुद्रहृदयोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१६६-रुद्राक्षजाबालोपनिषद् (सामवेद)
१६७-रुद्रोपनिषद्
१६८-लक्ष्म्युपनिषद्
१६९-लाङ्गूलोपनिषद्
१७०-लिङ्गोपनिषद्
१७१-बज्रपञ्जरोपनिषद्
१७२-बज्रसूचिकोपनिषद् (सामवेद)
१७३-बनदुर्गोपनिषद्
१७४-वराहोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१७५-वासुदेवोपनिषद् (सामवेद)
१७६-विश्रामोपनिषद्
१७७-विष्णुहृदयोपनिषद्
१७८-शरभोपनिषद् (सामवेद)
१७९-शाट्यायनीयोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
१८०-शाण्डिल्योपनिषद् (सामवेद)
१८१-शारीरकोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१८२-(१)शिवसङ्कल्पोपनिषद्
१८३-(२)शिवसङ्कल्पोपनिषद्
१८४-शिवोपनिषद्
१८५-शुकरहस्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१८६-शौनकोपनिषद्
१८७-श्यामोपनिषद्
१८८-श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषद्
१८९-श्रीचक्रोपनिषद्
१९०-श्रीविद्यात्तारकोपनिषद्
१९१-श्रीसूक्तम
१९२-श्वेताश्वतरोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१९३-षोढोपनिषद्
१९४-सङ्कर्षणोपनिषद्
१९५-सदानन्दोपनिषद्
१९६-संन्यासोपनिषद्(अध्यायात्मक) (सामवेद)
१९७-संन्यासोपनिषद्(वाक्यात्मक)
१९८-सरस्वतीरहस्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
२००-सर्वसारोपनिषद्( सर्वोप०) (कृष्णयजुर्वेदीय)
२०१-स ह वै उपनिषद्
२०२-संहितोपनिषद्
२०३-सामरहस्योपनिषद्
२०४-सावित्र्युपनिषद् (सामवेद)
२०५-सिद्धाँन्तविठ्ठलोपनिषद्
२०६-सिद्धान्तशिखोपनिषद्
२०७-सिद्धान्तसारोपनिषद्
२०८-सीतोपनिषद् (सामवेद)
२०९-सुदर्शनोपनिषद्
२१०-सुबालोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
२११-सुमुख्युपनिषद्
२१२-सूर्यतापिन्युपनिषद्
२१३-सूर्योपनिषद् (सामवेद)
२१४-सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् (ऋग्वेदीय)
२१५-स्कन्दोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
२१६-स्वसंवेद्योपनिषद्
२१७-हयग्रीवोपनिषद् (सामवेद)
२१८-हंसषोढोपनिषद्
२१९-हंसोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
२२०-हेरम्बोपनिषद्
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ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि।
सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु।
तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु।।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्ति!!!

अर्थातः- मेरे (हाथ-पाँव आदि) अङ्ग सब प्रकार से पुष्ट हों, वाणी, प्राण,नेत्र, श्रोत्र पुष्ट हों तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ बल प्राप्त करें। उपनिषद् में प्रतिपादित ब्रह्म ही सब कुछ है। मैं ब्रह्म का निराकरण (त्याग) न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे। इस प्रकार हमारा अनिराकरण (निरन्तर मिलन) हो, अनिराकरण हो। उपनिषदों में जो शम आदि धर्म कहे गये हैं वे ब्रह्मरूप आत्मा में निरन्तर रमण करने वाले मुझमें सदा बने रहें, मुझमें सदा बने रहें। आध्यात्मिक, अधिभौतिक और अधिदैविक ताप की शान्ति हों।

ॐ - उदगीथशब्दवाच्य-ॐ- इस अक्षर की उपासना करे--ॐ- यह अक्षर परमात्मा का सबसे समीपवर्ती (प्रियतम) नाम है। ॐ यह अक्षर उदगीथ है।
इन (चराचर) प्राणियों का पृथिवी रस (उत्पत्ति, स्थिति, और लय का स्थान) है। पृथिवी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुरुष है, पुरुष का का रस वाक् है, वाक् का रस ऋक् है, ऋक् का रस साम है और साम का रस उदगीथ (ॐ) है। ऋक् और साम के कारणभूत वाक् और प्राण ही मिथुन है। वह यह मिथुन ॐ इस अक्षर में संसृष्ट होता है। जिस समय मिथुन (मिथुन के अवयव) परस्पर मिलते हैं उस समय वे एक दूसरे की कामनाओं को प्राप्त कराने वाले होते है। अतः ॐ अक्षर(उदगीथ) की उपसना करने वाले की संम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति होती है। ॐकार ही अनुमति सूचक अक्षर है।
श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणित वेदान्त-दर्शन के अनुसार जो तीन मात्राओं वाले ओम् रूप इस अक्षर के द्वारा ही इस परम पुरुष का निरन्तर ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोक मे जाता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुली से अलग हो जाता है, ठीक उसी प्रकार से वह पापो से सर्वथा मुक्त हो जाता है। इसके बाद वह सामवेद की श्रुतियों द्वारा ऊपर ब्रह्मलोक में ले जाया जाता है। वह इस जीव-समुदाय रूप परमतत्त्व से अत्यन्त श्रेष्ठ अन्तर्यामी परमपुरुष पुरुषोत्तम को साक्षात् कर लेता है। तीनों मात्राओं से सम्पन्न ॐकार पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही है, अपरब्रह्म नहीं।
(ओ३म्) यह ओङ्कार शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है, क्योंकि यह तीन अक्षरों अ, उ, और म से मिल कर बना है, इनमें प्रत्येक अक्षर से भी परमात्मा के कई-कई नाम आते हैं। जैसे- अकार से विष्णु, विराट्, अग्नि और विश्वादि। उकार से महेश्वर, हिरण्यगर्भ, वायु और तैजसादि। मकार से ब्रह्मा, ईश्वर, आदित्य और प्रज्ञादि नामों का वाचक है। तथा अर्धमात्रा निर्गुण परब्रह्म परमात्मास्वरूप है। वेदादि शास्त्रों के अनुसार प्रकरण के अनुकूल ये सब नाम ईश्वर के ही हैं।

तैत्तरीयोपनषद शीक्षावल्ली अष्टमोंऽनुवाकः में ॐ के विषय में कहा गया हैः-

ओमति ब्रह्म। ओमितीद ँूसर्वम्।
ओमत्येदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति।
ओमति सामानि गायन्ति।
ओ ँूशोमिति शस्त्राणि श ँूसन्ति।
ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति।
ओमित्यग्निहोत्रमनुजानति।
अमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति।
ब्रह्मैवोपाप्नोति।।


अर्थातः- ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत की) अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

अर्थातः- ॐ वह (परब्रह्म) पूर्ण है और यह (कार्यब्रह्म) भी पूर्ण; क्योंकि पूर्ण से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है। तथा (प्रलयकाल में) पूर्ण (कार्यब्रह्म) का पूर्णत्व लेकर (अपने में ही लीन करके) पूर्ण (परब्रह्म) ही बच रहता है। त्रिबिध ताप की शान्ति हो।
ॐ को प्रणव भी कहते हैं; जिसका अर्थ पवित्र घोष भी है। यह शब्द ब्रह्म बोधक भी है; जिससे यह विश्व उत्पन्न होता हे, जिसमें स्थित रहताहै और जिसमें लय हो जाता है। यह विश्व नाम-रूपात्मक है, उसमें जितने पदार्थ है इनकी अभिव्यक्ति वर्णों अथवा अक्षरों से ही होती है। जितने भी वर्ण है वे अ (कण्ठ्य स्वर) और म् ओष्ठय स्वर के बीच उच्चरित होते हैं। इस प्रकार ॐ सम्पूर्ण विश्व की अभिव्यक्ति, स्थिति और प्रलय का द्योतक है।
सर्वे वेदा यतपदमामन्ति
तपा ँूसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति
तत्तेपद ँू संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्।।१५।
(कठोपनषद् अध्याय १ वल्ली २ श्लोक १५),

अर्थातः- सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं, जिसकी इक्षा से (मुमुक्षुजन) ब्रह्मचर्य का पालन करते है, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ। ॐ यही वह पद है।

ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं
सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते।
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्
यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति।।७।।
(प्रश्नोपनिषद् प्रश्न ५ श्लोक ७),

अर्थातः- साधक ऋग्वेद द्वारा इस लोक को, यजुर्वेद द्वारा आन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस लोक को प्राप्त होता है जिसे विद्वजन जानते हैं। तथा उस ओंङ्काररूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान् उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है।

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत।।
(मुन्डकोपनिषद्-मुन्डक २ खन्ड २ श्लोक-४)

अर्थातः- प्रणव धनुषहै, (सोपाधिक) आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानी पूर्वक बेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।।४।।

ओमित्येतदक्षरमिद ँ्सर्व तस्योपव्याख्यानं भूत,
भवभ्दविष्यदिति सर्वमोंङ्कार एव।
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव।।१।।
( माण्डूक्योपनिषद् गौ० का० श्लोक १)

अर्थातः-ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है।

सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।।८।।
( माण्डूक्योपनिषद् आ०प्र० गौ०का० श्लोक ८ )

वह यह आत्मा ही अक्षर दृष्टि से ओंङ्कार है; वह मात्राओं का विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं।

यह आत्मा अध्यक्षर है; अक्षर का आश्रय लेकर जिसका अभिधान(वाचक) की प्रधानता से वर्णन किया जाय उसे अध्यक्षर कहते हैं। जिस प्रकार अकार नामक अक्षर अदिमान् है उसी प्रकार वैश्वानर भी है। उसी समानता के कारण वैश्वानर की अकार रूपता है। अकार निश्चय ही सम्पूर्ण वाणी है श्रुति के अनुसार अकार से समस्त वाणी व्याप्त है। ओङ्कार की दूसरी मात्रा ऊकार है उत्कर्ष के कारण जिस प्रकार अकार से उकार उत्कृष्ट-सा है उसी प्रकार विश्व से तैजस उत्कृष्ट है। जिस प्रकार उकार अकार और मकार के मध्य स्थित है उसी प्रकार विश्व और प्राज्ञ के मध्य तैजस है। सुषुप्ति जिसका स्थान है वह प्राज्ञ मान और लय के कारण ओङ्कार की तीसरी मात्रा मकार है। जिस प्रकार ओङ्कार का उच्चारण करने पर अकार और उकार अन्तिम अक्षर में एकीभूत हो जाते हैं उसी प्रकार सुषुप्ति के समय विश्व और तैजस प्राज्ञ में लीन हो जाते हैं। अमात्र-जिसकी मात्रा नहीं है वह अमात्र ओङ्कार चौथा अर्थात तुरीय केवल अत्मा ही है। इस प्रकार अकार विश्व को प्राप्त करादेता हैतथा उकार तैजस को और मकार प्राज्ञ को; किन्तु अमात्र में किसी की गति नहीं है। अतः प्रणव ही सबका आदि, मध्य और अन्त है।प्रणव को इस प्रकार जानने के अनन्तर तद्रूपता को प्राप्त हो जाता है। प्रणव को ही सबके हृदय में स्थिति ईश्वर जाने। इस प्रकार सर्वव्यापी ओङ्कार को जानकर बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता। तैतरीयोपनिषद में कहा है कि जिस प्रकार शंकुओं(पत्तों की नसों) से संपूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकार से सम्पूर्ण वाणी व्याप्त है-ओंकार ही यह सब कुछ है।

ॐ का महत्व

ॐ का महत्व इस तथ्य से भी जाना जा सकता है कि नासा के वैज्ञानिकों ने आन्तरिक्ष में किसी अन्य ग्रह पर जीवन है कि नहीं,यह जानने के लिये जो ध्वनि चुनकर भेजी है; वह ॐ ही है।इसका तातपर्य यह है कि ब्रह्मांड में ॐ ही एक ऐसी ध्वनि है जो सभी जगह पहचानी जा सकती है तथा सभी के मूल श्रोत के रूप में है।