आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

धर्म एक मार्ग

इस चित्र को ध्यान से देखें, यह चित्र भगवत गीता के एक श्लोक की चित्रित व्याख्या है,
जिसके अनुसार यह मानव शरीर एक रथ के समान है, जिसमें जीव यात्रा करता है |
मानव शरीररूपी इस रथ के घोड़े मानव कर्मेन्द्रियाँ हैं, लगाम मन है, और सारथि बुद्धि है
परन्तु जो चित्र और श्लोक दोनों में ही नहीं हैं वह इस प्रकार हैं -
पहिये सयंम और चरित्र हैं
इस मानव शरीररूपी रथ का गंतव्य (मंजिल) परमपिता परमात्मा है |
और यह रथ जिस मार्ग पर चल रहा है, वही धर्म है |
इस मार्ग पर कई मोड़ हैं, माया रुपी संसार है, इस पथ से भटकना ही, नया मार्ग अपना लेना ही धर्म पथ विमुख होना है !

इसलिए प्रत्येक जीव को सही मार्ग अर्थात धर्म को अपना कर ही अपनी जीवन यात्रा करनी चाहिए!