आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

मंगलवार, 30 मार्च 2010

गरीबी कैसे बिकती है? (भाग - २)



तो हमारे प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं -

वैसे तो अमीर बनने के कई तरीके लोकसंसार में प्रचलित हैं, यदि कोई भी अमीर बनना चाहता है तो उसे केवल गरीबी को केंद्र में रखकर अपना कारोबार शुरू करना होता है, साहब एक उद्योग शुरू करेंगें और सरकार से कई अधिकार लेंगे, कहेंगे गरीबों को रोजगार देंगें, ऐसा होता भी है कृषक भूमियों का अधिग्रहण होता है केवल गरीबी मिटाने के नाम पर

गरीबों का श्रम, पूंजीपति की पूँजी और प्रोडक्ट तैयार, साथ ही साथ बेंचने के लिए गरीबों का बाजार अपने - अपने आप तैयार !

यदि प्रोडक्ट गरीब लक्षित भी हो तो भी कहीं कहीं से उसका अंतिम भार तो उसके सर आ ही जाएगा, क्योंकि हमारी अर्थव्यस्था में कर - हस्तांतरण विधि द्वारा ही गरीबों को अंतिम लक्ष्य बनाया जाता है, बनाया भी क्यों न जाये, आखिर भैया गरीबी जो बेंचनी है, प्रोडक्ट बिकता रहता है और उसी के साथ - साथ गरीबी भी

ये तो बात हुई उनकी जिनके बाप - दादा गरीबी बेंच कर अपने लाडलों के लिए पूँजी छोड़ गए जिससे की वे गरीबी बेंचने के व्यापार को और अधिक बड़ा कर सकें !

अब बात एक ऐसे वर्ग की जो कमाना तो चाहते हैं, पर कमाने के लिए तो गरीबी बेंचनी पड़ेगी यह भी जानते हैं और उसके लिए तो पूँजी की आवश्यकता होगी यह भी जानते है, लेकिन पूँजी का न होना कमाई में बाधा बन जाए यह जरूरी तो नहीं "जहाँ चाह, वहां राह"

इस वर्ग के लोग या तो गरीब ही होते हैं या गरीबों के बहुत करीब होते हैं, ये गरीबों को समझातें हैं कि हमारा शोषण हो रहा है, हमें गरीबी बेंची जा रही है ! लेकिन अब हम आप के अधिकारों के लिए लड़ेंगे आदि बातें कह कर गरीबों के प्रतिनिधि बन जाते हैं, ऐसे लोग गली-मोहल्ले, गावं कस्बे, जिले और राज्य के स्तर पर होते हैं, इन्ही को हम जन प्रतिनिधि कहते हैं, यह वर्ग कैसे कमाता है अर्थात कैसे गरीबी को बेंचता है यह बात कम से कम किसी भारतीय को समझाने की जरूरत नहीं है

हो सकता है मेरी बातें आप के समझ में ना आए, आएगी भी कैसे आज तक समझ में आई है किसी के गरीबी और यदि आ भी जाए तो आप कर क्या लेंगे !

शेष प्रश्नों के उत्तर ईश्वर की दया से अगले पोस्ट में !

बस एक ही धुन जय-जय भारत

बुधवार, 24 मार्च 2010

गरीबी कैसे बिकती है?


गरीबी कैसे बिकती है?

गरीबी को बेचना बड़ा ही सरल कार्य है, गरीब को छोड़ कर कोई भी इसे बेच सकता है, लेकिन सवाल वहीँ आ गया कैसे?

पहले आप कुछ सवालों का जवाब दीजिये फिर मैं बताता हूँ -

  • लोग अमीर कैसे होते हैं?
  • देश की सरकार कैसे बनती है?
  • जननेता कैसे बनते हैं?
  • खबरिया चैनेल अवार्ड कैसे जीतते हैं?
  • अखबार कैसे बिकतें है?
  • धर्म की दुकान कैसे चलती है?
  • बड़े वाले बाबा जी कैसे बनते हैं?

सही दिशा में बढ़ रहें हैं हम, सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है !

इस बात को अच्छी तरह समझ लीजिये की गरीबी केवल गरीबों को ही बेंची जा सकती है.

यदि उत्तर आपके पास है तो लिख दीजिये कमेन्ट बॉक्स में ! नहीं तो यह कठिन कार्य हम अकेले ही करने का प्रयास करेंगे

मंगलवार, 23 मार्च 2010

आखिर ये गरीबी चीज क्या है ?


आखिर ये गरीबी चीज क्या है ?

गरीबी एक ऐसी चीज है जो आदमी कभी अपने लिए नहीं चाहता और ना ही अपने अपनों के लिए चाहता है | अब क्या कहूं कुछ लोगों को तो यह शीर्षक पसंद ही नहीं आएगा, और कोई देशप्रेमी, सामाजिक आदमी अगर पढ़ भी ले तो कम से कम किसी और से तो इस विषय पर चर्चा नहीं करेगा और कर भी ले तो यह संकल्प तो कभी भी नहीं करेगा की मैं इस गरीबी नाम की चीज को अब इस बाजार में कम से कम भारतीय बाजार में तो बिकने नहीं दूंगा, क्योंकि ये शब्द ही इतना भयानक है कि, कोई इसका नाम भी लेना नहीं चाहेगा, लेना भी क्यों चाहेगा, पनौती है सर पड़ गई तो |

सोचिये जिस चीज का हम नाम भी लेना नहीं चाहते वह बाजार में धडल्ले से बिक रही है, हमारे आस-पास के बाजार में |

लेकिन आप अब तक क्या समझे, बिल्कुल ठीक समझ रहें हैं गरीबी एक वस्तु है, जो कोई खरीदना नहीं चाहता, फिर भी बिकती है, इसका मार्केट तो बहुत बड़ा है, बहुत ही बड़ा है इतना बड़ा की पूरा भारत ही इसकी गिरफ्त में है,वैश्वीकरण के प्रयास निरंतर जारी हैं | इस वस्तु का सबसे बड़ा बाजार विकासशील देश हैं, और उन देशों का मुखिया है भारत |

गरीबी एक भौतिक वस्तु है जो बहुत सी वस्तुओं के उत्पादन में प्राथमिक वस्तु होती है, ये वस्तुएं है, कुपोषण, रोग, निरक्षरता, असमानता और भी बहुत कुछ | इसमें कोई संदेह नहीं की कोई भी इसे लेना नहीं चाहता तो फिर यह बिकती कैसे है, यह तो बहुत बड़ा प्रश्न है की गरीबी बिकती कैसे है ! यदि आपको पता है तो लिखियेगा जरूर !

नहीं तो प्रतीक्षा करें !

अगले पोस्ट का - गरीबी कैसे बिकती है?

शनिवार, 20 मार्च 2010

स्वतंत्रता का उत्सव









संविधान सभा को संबोधित करते हुए १९४७ में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, "स्वतंत्रता की प्राप्ति तो एक कदम मात्र है, एक सुअवसर का आरम्भ मात्र है - अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं . ये होंगे निर्धनता, अज्ञान, रोग और अवसरों की असमानताओं के उन्मूलन के उत्सव ."

किन्तु क्या हुआ, क्या नहीं हुआ, कौन से उत्सव मनाये गए और कौन से उत्सव नहीं मनाये गए, इन सब पर चर्चा करने से पहले अगर एक छोटी सी कहानी पढ़ लें तो अच्छा रहेगा, ये कहानी भारत के बारे कई सच उजागर करती है, कहानी है दो भारतीय बालिकाओं की "रमा और सुधा " ये मत कहियेगा की कहानी फिल्मी है, ये तो एक सम्पूर्ण वास्तविकता है |

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रमा और सुधा का जन्म एक ही दिन हुआ था. रमा के माता - पिता निर्माण कार्य में लगे मजदूर थे तो सुधा के पिता एक बड़े व्यवसायी और माँ एक डॉक्टर थी |
रमा की माँ प्रसव पीड़ा आरम्भ होने तक अपने सर पर ईंटे ढोती रही . दर्द आरम्भ होने पर वह निर्माण स्थल पर ही औजार आदि रखने की जगह पर चली गई और वहां अपनी बच्ची को जन्म दिया . उसने अपनी बच्ची को दूध पिलाया, फटे पुराने से एक कपडे में उसे लपेट कर, बोरी के झूले में रख कर पेड़ से लटकाकर, तुरंत अपने काम पर चली गई, उसे डर था की कहीं उसे काम से निकाल न दिया जाए .
सुधा का जन्म शहर के सर्वश्रेष्ठ नर्सिंग होम में हुआ . जन्म के बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों के टीम ने उसकी जांच की, उसे एक मुलायम कपडे में लपेटा गया और उसे माँ के पास एक मखमली झूले में लिटा दिया गया . माँ ने उसे दूध पिलाया, प्यार किया दुलार किया और थपकियाँ देकर सुला दिया . कई सगेसम्बन्धी सुधा को देखने आये और बाद में सब ने मिल कर उसके जन्म का उत्सव मनाया |
दोनों का बचपन बहुत ही अलग रहा, रमा ने बहुत कम आयु में ही अपनी देखभाल स्वयं करना सीख लिया . उसे भूख और अभाव की पूरी अनुभूति थी . उसने कूड़े के ढेर से खाने की चीजें बीनना सीख लिया, सर्दी में बिना गर्म कपड़ों के गर्म रहना भी, बरसात से बिना छत सर छुपाना भी, बिना खिलौनों के खेलना भी उसने सीख लिया . वह निर्दयी प्रकृती से जीवन के लिए हर दिन जंग कर रही थी और उसे हरा भी रही थी .वह स्कूल नहीं जा पाई क्योंकि उसके माता - पिता प्रवासी मजदूर थे |
सुधा को बड़े लाड-प्यार से पाला गया उसे शायद ही किसी चीज का अभाव रहा, जो चाहा वो मिला . उसे एक अच्छे बालविकास विद्यालय में भेजा गया, वहां उसने खेल-खेल में ही लिखना, गिनना और पढ़ना सीख लिया .वह चिडियाघर, खगोलशाला और क्रीडाग्रहों में गई, उसके बाद अच्छा स्कूल और अच्छा विश्वविद्यालय मिला, आज वह एक विश्वविद्यालय में अध्यापिका है |
रमा देखने में सुंदर थी पर कुपोषण और मलिनता ने उसकी सुन्दरता को ढक दिया था . उसके मन में भी बहुत सी अभिलाषाएं थी, पर उसे १० वर्ष की आयु में ही उसे काम करना पडा . वह न जाने कितनी यातनाओं का शिकार बनी, आज वह कहाँ है पता नहीं |
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प्रस्तुत कहानी स्कूल में किसी कक्षा में पढी थी, उस समय कुछ खास विचार जगे नहीं, परन्तु जब विचार जगे देश की दुर्दशा देखी तो महसूस किया ये कहानी नहीं हकीकत है, परिस्थितियां और पात्र अलग हो सकतें हैं परन्तु हकीकत एक ही है असमानता और निर्धनता . फिर सोचा की मुझे क्या फर्क पड़ता है इस देश में तो ऐसा होना आम बात है, मैं तो सुखी हूँ न ! यहीं स्थिति आज हमारे सभी समाज की है, लोगों के पास धर्म के नाम पर समय ख़राब करने के लिए समय है, कविता और गजल लिखने के लिए समय है, लेकिन इस गंभीर समस्या को जानने, समझने और निवारण हेतु उपाय सुझाने के लिए समय नहीं है, अगर इसके लिए फिर भी समय नहीं है तो एडम स्मिथ के ये शब्द हमें याद रखने चाहिए " वह समाज कभी सुखी और संपन नहीं हो सकता, जिसके अधिकांशतः सदस्य निर्धन हों" |
निर्धनता और असमानता का जितना हो सके अध्धयन करके फिर अगले पोस्ट में लिखूंगा |

सोमवार, 15 मार्च 2010

वह शक्ति हमें दो दयानिधे

वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्त्तव्य मार्ग पर डट जाएँ
पर सेवा पर उपकार में हम
निज जीवन सफल बना जाएँ
वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्त्तव्य मार्ग पर डट जाएँ
हम दीन दुखी निर्बलों विकलों
के सेवक बन संताप हरें
जो हैं अटके, भूले भटके
उनको तारें खुद तर जाएँ
वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्त्तव्य मार्ग पर डट जाएँ
छल द्वेष दंभ पाखण्ड झूठ
अन्याय से निसी दिन दूर रहें
जीवन हो शुद्ध सरल अपना
सुचि प्रेम सुधा रस बरसायें
वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्त्तव्य मार्ग पर डट जाएँ
पर सेवा पर उपकार में हम
निज जीवन सफल बना जाएँ
निज आन मान मर्यादा का
प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे
जिस देश जाति में जन्म लिया
बलिदान उसी पर हो जाएँ
वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्त्तव्य मार्ग पर डट जाएँ
पर सेवा पर उपकार में हम
निज जीवन सफल बना जाएँ
वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्त्तव्य मार्ग पर डट जाएँ

शनिवार, 6 मार्च 2010

देशभक्तों की चौपाल

एक राष्ट्र के नागरिकों के विचार ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, विचारों के आन्दोलन से ही भौतिक आन्दोलनों का प्रारंभ होता है, जिससे राष्ट्र की समस्याओं का समाधान होता है और राष्ट्र प्रगति की ओर अग्रसर होता है, परन्तु यदि राष्ट्रहित के विचारों का उदय ही ना हो या हो भी तो उन विचारों में मतभेद हो तो राष्ट्र का पतन होना आरम्भ हो जाता है, राष्ट्र प्रेम तो सबमें होता है, परन्तु विचारों के मतभेद के कारण राष्ट्र प्रगति की ओर कदम बढ़ा कर भी आगे नहीं बढ़ पाता और पाकिस्तान जैसी समस्याएं देश को विभाजित कर देती हैं. आज का पाकिस्तान वैचारिक मतभेद का ही एक उदाहरण है. देशप्रेम जब स्वार्थ, उपराष्ट्रवाद, प्रांतवाद, भाषावाद, धार्मिक कट्टरता, जातीय विखंड़ता, वोट बैंक की राजनीति, धर्म के नाम पर व्यवसाय आदि विभिन्न प्रकार के नकारात्मक विचारों प्रभावित हो रहा तो इस परिस्थिति में राष्ट्र के नागरिकों के विचारों का समन्वय अति आवश्यक है, राष्ट्रहित के कई विचार हमारे मन में जागृत हो कर समाप्त हो जातें है, यदि सभी प्रकार के सकारात्मक, राष्ट्रभावानाभावित विचारों को हम राष्ट्रहित के पथ मोड़ दें तो हमारा देश विश्व का सिरमौर बन सकता है, यहाँ के सभी नागरिक खुशहाल हो सकतें हैं, इसी क्षेत्र में देशभक्तों की चौपाल के माध्यम से हम छोटा सा प्रयास कर रहें है (प्रत्येक देशभक्त इस चौपाल पर अपना मत अवश्य रखे)