आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

शनिवार, 20 मार्च 2010

स्वतंत्रता का उत्सव









संविधान सभा को संबोधित करते हुए १९४७ में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, "स्वतंत्रता की प्राप्ति तो एक कदम मात्र है, एक सुअवसर का आरम्भ मात्र है - अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं . ये होंगे निर्धनता, अज्ञान, रोग और अवसरों की असमानताओं के उन्मूलन के उत्सव ."

किन्तु क्या हुआ, क्या नहीं हुआ, कौन से उत्सव मनाये गए और कौन से उत्सव नहीं मनाये गए, इन सब पर चर्चा करने से पहले अगर एक छोटी सी कहानी पढ़ लें तो अच्छा रहेगा, ये कहानी भारत के बारे कई सच उजागर करती है, कहानी है दो भारतीय बालिकाओं की "रमा और सुधा " ये मत कहियेगा की कहानी फिल्मी है, ये तो एक सम्पूर्ण वास्तविकता है |

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रमा और सुधा का जन्म एक ही दिन हुआ था. रमा के माता - पिता निर्माण कार्य में लगे मजदूर थे तो सुधा के पिता एक बड़े व्यवसायी और माँ एक डॉक्टर थी |
रमा की माँ प्रसव पीड़ा आरम्भ होने तक अपने सर पर ईंटे ढोती रही . दर्द आरम्भ होने पर वह निर्माण स्थल पर ही औजार आदि रखने की जगह पर चली गई और वहां अपनी बच्ची को जन्म दिया . उसने अपनी बच्ची को दूध पिलाया, फटे पुराने से एक कपडे में उसे लपेट कर, बोरी के झूले में रख कर पेड़ से लटकाकर, तुरंत अपने काम पर चली गई, उसे डर था की कहीं उसे काम से निकाल न दिया जाए .
सुधा का जन्म शहर के सर्वश्रेष्ठ नर्सिंग होम में हुआ . जन्म के बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों के टीम ने उसकी जांच की, उसे एक मुलायम कपडे में लपेटा गया और उसे माँ के पास एक मखमली झूले में लिटा दिया गया . माँ ने उसे दूध पिलाया, प्यार किया दुलार किया और थपकियाँ देकर सुला दिया . कई सगेसम्बन्धी सुधा को देखने आये और बाद में सब ने मिल कर उसके जन्म का उत्सव मनाया |
दोनों का बचपन बहुत ही अलग रहा, रमा ने बहुत कम आयु में ही अपनी देखभाल स्वयं करना सीख लिया . उसे भूख और अभाव की पूरी अनुभूति थी . उसने कूड़े के ढेर से खाने की चीजें बीनना सीख लिया, सर्दी में बिना गर्म कपड़ों के गर्म रहना भी, बरसात से बिना छत सर छुपाना भी, बिना खिलौनों के खेलना भी उसने सीख लिया . वह निर्दयी प्रकृती से जीवन के लिए हर दिन जंग कर रही थी और उसे हरा भी रही थी .वह स्कूल नहीं जा पाई क्योंकि उसके माता - पिता प्रवासी मजदूर थे |
सुधा को बड़े लाड-प्यार से पाला गया उसे शायद ही किसी चीज का अभाव रहा, जो चाहा वो मिला . उसे एक अच्छे बालविकास विद्यालय में भेजा गया, वहां उसने खेल-खेल में ही लिखना, गिनना और पढ़ना सीख लिया .वह चिडियाघर, खगोलशाला और क्रीडाग्रहों में गई, उसके बाद अच्छा स्कूल और अच्छा विश्वविद्यालय मिला, आज वह एक विश्वविद्यालय में अध्यापिका है |
रमा देखने में सुंदर थी पर कुपोषण और मलिनता ने उसकी सुन्दरता को ढक दिया था . उसके मन में भी बहुत सी अभिलाषाएं थी, पर उसे १० वर्ष की आयु में ही उसे काम करना पडा . वह न जाने कितनी यातनाओं का शिकार बनी, आज वह कहाँ है पता नहीं |
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प्रस्तुत कहानी स्कूल में किसी कक्षा में पढी थी, उस समय कुछ खास विचार जगे नहीं, परन्तु जब विचार जगे देश की दुर्दशा देखी तो महसूस किया ये कहानी नहीं हकीकत है, परिस्थितियां और पात्र अलग हो सकतें हैं परन्तु हकीकत एक ही है असमानता और निर्धनता . फिर सोचा की मुझे क्या फर्क पड़ता है इस देश में तो ऐसा होना आम बात है, मैं तो सुखी हूँ न ! यहीं स्थिति आज हमारे सभी समाज की है, लोगों के पास धर्म के नाम पर समय ख़राब करने के लिए समय है, कविता और गजल लिखने के लिए समय है, लेकिन इस गंभीर समस्या को जानने, समझने और निवारण हेतु उपाय सुझाने के लिए समय नहीं है, अगर इसके लिए फिर भी समय नहीं है तो एडम स्मिथ के ये शब्द हमें याद रखने चाहिए " वह समाज कभी सुखी और संपन नहीं हो सकता, जिसके अधिकांशतः सदस्य निर्धन हों" |
निर्धनता और असमानता का जितना हो सके अध्धयन करके फिर अगले पोस्ट में लिखूंगा |

1 टिप्पणी:

  1. अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं