आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

हे! मेरे प्रभु बजरंगबली मुझे बुद्धिहिन जानकर क्षमा करें !!! आप चरणों में कोटि-कोटि वंदन !!! - (10000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000....अनंत तक)

हे! मेरे प्रभु बजरंगबली मुझे बुद्धिहिन जानकर क्षमा करें !!! आप चरणों में कोटि-कोटि वंदन !!! - (10000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000....अनंत तक)

हनुमान चालीसा तुलसीदास की एक काव्यात्मक कृति है, जिसमें प्रभु राम के महान् भक्त हनुमान के गुणों एवं कार्यों का चालीस चौपाइयों में वर्णन है। यह अत्यन्त लघु रचना है जिसमें पवनपुत्र श्री हनुमान जी की सुन्दर स्तुति की गई है। इसमें बजरंग बली‍ की भावपूर्ण वंदना तो है ही, श्रीराम का व्यक्तित्व भी सरल शब्दों में उकेरा गया है।

वैसे तो पूरे भारत में यह लोकप्रिय है किन्तु विशेष रूप से उत्तर भारत में यह बहुत प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय है। लगभग सभी हिन्दुओं को यह कंठस्थ होती है। कहा जाता है कि इसके पाठ से भय दूर होता है, क्लेश मिटते हैं। इसके गंभीर भावों पर विचार करने से मन में श्रेष्ठ ज्ञान के साथ भक्तिभाव जाग्रत होता है। इस रचना के साथ विशेष बात यह है कि दक्षिण भारत के मंदिरों में भी यह वहाँ की लिपि में लिखा हुआ देखा जा सकता है, तथा दक्षिण के हनुमान् भक्त यदि हिन्दी न भी जानते हों तो भी इसे एक मंत्र के समान याद रखते हैं। उल्लेखनीय है कि संस्कृत के तो अनेक स्तोत्र उत्तर-दक्षिण में प्राचीन काल से ही समान रूप से लोकप्रिय हैं, परन्तु भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी की विरली ही रचनाओं को यह गौरव प्राप्त है।

श्री हनुमान चालीसा

॥ जय श्री राम ॥

।।श्री हनुमते नमः।।

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन-कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार।।

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।।

राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै।।

संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन।।

बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रुप धरि सियहि दिखावा। बिकट रुप धरि लंक जरावा।।

भीम रुप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे।।

लाय संजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।

रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते।।

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।।

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहु को डरना।।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनो लोक हाँक ते काँपै।।

भूत पिसाच निकट नहि आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।

संकट तें हनुमान छुडावैं। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।

और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।।

चारो जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।

साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै।।

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नाई।।

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महासुख होई।।

जो यह पढै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।

दोहा

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

।।इति ।।


श्री राम भक्त हनुमान के चरणों की वंदना करता हुआ - पंकज सिंह राजपूत


!!!!!!!!!!! जय-जय श्रीराम !!!!!!!!!!!!!!

5 टिप्‍पणियां:

  1. श्री राम भक्त हनुमान के चरणों की वंदना करता हुआ - पंकज सिंह राजपूत



    !!!!!!!!!!! जय-जय श्रीराम !!!!!!!!!!!!!!

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  2. भैया मेरा देश मेरा धर्म जी ,
    बजरंगदल वालों को ग़लतफ़हमी हो गयी है की आप श्रीहनुमत लालजी के बारे में कुछ उल्टा-सीधा कह रहें है. इसका कारण मैंने आपको बताया ही था की,शब्दों को थोडा खुला छोड़ते हुए अपनी बात कहें, जल्दबाजी में अर्थ-का अनर्थ हो रहा है.
    और सबसे बड़ा भ्रम जमाल साहब को आपके "गुरूजी" वाले संबोधन से भी होता है . अच्छी बात है बड़े तो गुरु सामान ही होते है. उन्हें गुरु कहने में कोई बुराई नहीं है. पर आपकी एक सार्वजानिक छवि बन चुकी है,इसलिए ऐसे संबोधन गले की फांस भी बन जाते है.बाकी आप समझदार है.

    जय श्री राधे-राधे !!!

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  3. hanuman ji charo vedo ke gyata the .rah kaj yani rashtra karya,yahi thi hanuman ji ki aradhna.
    apko bahut-2 dhanyabad.

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं