आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

हिन्दू-मुस्लिम एकता मतभेद


आज पूरे भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता की बातें चल रहीं, हिन्दू-मुस्लिम एकता अर्थात दो विचारधाराओं की एकता - दो बड़ी नदियों का संगम

, परन्तु मुझे यह एकता केवल शब्दों की एकता लगती है, क्योंकि कहीं ना कहीं इस एकता में भी शर्तें प्रावधानित हैं, अर्थात हिन्दुओं का कहना है की मुसलमान अपनी विचारधारा में थोडा सा परिवर्तन कर लें और मुसलमान चाहते हैं की हिन्दू अपनी विचारधारा में उनके प्रति थोडा परिवर्तन कर लें !

यह समझा जाना चाहिए कि देश में हिंदू एवं मुसलमानों में मतभेद शुरू से ही रहे हैं जिसका साम्राज्यवादी ताकतों ने बडी चालाकी से इस्तेमाल किया और भारत को पराधीन कर शोषित किया और अन्तः परिणाम देश के विभाजन के रूप में सामने आया। विभाजन के समय एनी बेसेंट और मोहम्मद जिन्ना ने एक फार्मूला तैयार किया था जिसमें मुसलमानों को उनकी आबादी की तुलना में अधिक प्रतिशतता दी गई थी। इस पर विचार भी करने की जरूरत है कि महात्मा गाँधी, एक ऐसे व्यक्ति की हत्या जो अहिंसा, शांति और प्रेम की बात करता था और नवजात शिशु की तरह सुरक्षारहित था उसकी हत्या भी हिंदू एवं मुसलमानों के मतभेद के कारण हुई


प्रत्यक्ष देखें तो इस हिन्दू-मुस्लिम मतभेद ने देश का विभाजन भी करवाया, हजारों बेगुनाहों को बेमौत मरवाया और एक महापुरूष - महात्मा के प्राणों की आहुति भी मतभेद रुपी हवनकुंड में डलवा दी


आज जब भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, तब स्वतन्त्रता के अर्ध-शताब्दी के बाद भी हम हिन्दू-मुस्लिम एकता को स्थापित करने के प्रयास और केवल प्रयास ही कर रहें हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता को स्थापित करने में भी एक व्यापक मतभेद दोनों ही वर्गों के बीच है, ऊपर से कोई कुछ भी बोले अंतर्मन में तो एक-दूसरे के संस्कृतियों और विचारों पर आरोप और प्रत्यारोप करने की जड़त्व संकीर्णता पूर्णतः स्थापित है। जिसको जब, जहाँ, जैसे जगह मिलती है, हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर ही परिक्रमापूर्ण विचारों के साथ अपनी संकीर्णता को जगजाहिर कर देता है


हिन्दू-मुस्लिम मतभेद ने देश का विभाजन भी करवाया, हजारों बेगुनाहों को बेमौत मरवाया और एक महापुरूष - महात्मा के प्राणों की आहुति भी मतभेद रुपी हवनकुंड में डलवा दी और अब यह हिन्दू-मुस्लिम एकता और इसे स्थापित करने की संकीर्ण विचारधारा न जाने क्या करवाएगी?

ना जाने कब इन दोनों महानदियों नदियों का संगम होगा और ना जाने कब इनके संगम पर कुम्भ लगेगा ?!!??<>

5 टिप्‍पणियां:

  1. आप मुस्लिम क्त्त्र्त को हिन्दुओन की दयालुता से कैसे तुलन कर स्क्ते है न तो आप मुस्लिम सिधंतोन से प्रिचित हैन न ही आप उन के रीति रिवाज से अल्गव केवल मुस्लिम कत्तर्प्न चाहत है हिन्दु नही
    वेद व्यथित

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  2. सही समय पर जब सही निर्णय नही लिआ जाता तो ऐसी समस्याएं आती ही रहती हैं..

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  3. हिन्दू-मुस्लिम मतभेद ने देश का विभाजन भी करवाया, हजारों बेगुनाहों को बेमौत मरवाया
    hazaron ke bajay Lakhon kehna zyada thik hai . Aaj pehli bar apke blog par aana hua , achha laga . u r genius really .

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  4. गुरूजी बहुत - बहुत धन्यवाद for coming on this blog !
    !हजारों नहीं लाखों बेगुनाहों को बेमौत मरवाया !

    !!!! बस एक ही धुन जय-जय भारत !!!!!

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  5. धर्म की दया सरिस हरिजाना (७-११२-१०)
    दया के सामान कोई धर्म नहीं है .
    "परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई"

    परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा , पर निंदा सम अघ न गरीसा (७-१२१-२२)
    अहिंसा के बराबर कोई परम धर्म नहीं है, इस बात से कौन दुष्ट इनकार करेगा . कौन सा धर्म हिंसा की छूट देगा ,और जो हिंसा की छूट दे तो उसको धर्म कैसे माना जाये .

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं