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बुधवार, 21 अप्रैल 2010

ब्रह्म क्या है? जीव क्या है? आत्मा क्या है? ब्रह्मांण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई है?


ब्रह्म क्या हैजीव क्या हैआत्मा क्या हैब्रह्मांण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई है? 
इन सभी बिंन्दुओं पर विस्त्रित व्याख्या हमारे वेदों में भरी पडी़ है। सम्पूर्ण पिण्ड-ब्रह्माण्ड और परमात्मा को जानने का विज्ञान ही वेद है। वेद मानव सभ्यताभारतीय संस्कृति के मूल श्रोत हैं। इनमें मानव-जीवन के लौकिक एवं पारलौकिक उन्नति के लिये उपयोगी सभी सिद्धान्तों एवं उपदेशों का अद्भुत वर्णन है। वेद एक प्रकार से मंत्र का विज्ञान हैजिसमें विराट् विश्व ब्रह्मांड की अलौकिक शूक्ष्म एवं चेतन सत्ताओं एवं शक्तियों तक से सम्बन्ध स्थापित करने करने के गूढ़ रहस्य दिये हुये है। भौतिक विज्ञानी अभी तक इस क्षेत्र में मामुली सी जानकारी ही प्राप्त कर सके हैं।
       वेद का अर्थ है ज्ञान। वेद शब्द विद सत्तायाम,विदज्ञाने,विदविचारणे एवं विद्लाभे इन चार धातुओं से उत्पन्न होता है। संक्षिप्त में इसका अर्थ हैजो त्रिकालबाधित सत्तासम्पन्न होपरोक्ष ज्ञान का निधान होसर्वाधिक विचारो का भंडार हो और लोक परलोक के लाभों से परिपूर्ण हो। जो ग्रंथ इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार के उपायों का ज्ञान कराता हैवह वेद है। भारतीय मान्यता के अनुसार वेद ब्रह्मविद्या के ग्रंथभाग नहीस्वयं ब्रह्म हैं-शब्द ब्रह्म हैं। प्राचीन काल से हमारे ऋषि-महर्षिआचार्य तथा भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले विद्वानों ने वेद को सनातननित्य और अपौरूषेय माना हैं। उनकी यह मान्यता रही है कि वेद का प्रादुर्भाव ईश्वरीय ज्ञान के रूप में हुआ है। इसका कारण यह भी है कि वेदों का कोई भी निरपेक्ष या प्रथम उच्चरयिता नहीं है। सभी अध्यापक अपने पूर्व-पूर्व के अध्यापकों से ही वेद का अध्ययन या उच्चारण करते रहे हैं। वेद का ईश्वरीय ज्ञान के रूप में ऋषि-महर्षियों ने अपनी अन्तर्दृष्टि से प्रत्यक्ष दर्शन किया। द्रष्टाओं का यह भी मत है कि वेद श्रेष्ठतम ज्ञान-पराचेतना के गर्भ में सदैव से स्थित रहते हैं। परिष्कृत-चेतना-सम्पन्न ऋषियों के माध्यम से वे प्रत्येक कल्प में प्रकट होते हैं। कल्पान्त में पुनः वहीं समा जाते हैं।
       वेद को श्रुतिछन्दस् मन्त्र आदि अनेक नामों से भी पुकारा जाता है। विष्णुभागवतवायुमत्स्य आदि पुराणों के अनुसार त्रेतायुग के अन्त तक वेद एक ही था। द्वापर के अन्त में महर्षि वेदव्यास ने वेद के चार विभाग कियेः-
-ऋग्वेद ।
-यजुर्वेद ।
-सामवेद ।
-अथर्ववेद ।
       जिसमें नियताक्षर वाले मंत्रों की ऋचाएँ हैं,वह ऋग्वेद कहलाता है। जिसमें स्वरों सहित गाने में आने वाले मंत्र हैंवह सामवेद कहलाता है। जिसमें अनितह्याक्षर वाले मंत्र हैंवह यजुर्वेद कहलाता है। जिसमें अस्त्र-शस्त्रभवन निर्माण आदि लौकिक विद्याओं का वर्णन करने वाले मंत्र हैंवह अथर्ववेद कहलाता है। वेद मंत्रों के समूह को शूक्त कहा जाता हैजिसमें एकदैवत्य तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है।
       वेद की समस्त शिक्षाएँ सर्वभौम है। वेद मानव मात्र को हिन्दू,सिखमुसलमानईसाई बौद्ध,जैन आदि कुछ भी बनने के लिये नहीं कहतें। वेद की स्पष्ट आज्ञा है-मनुर्वभ। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि के मूल तत्वगूढ़ रहस्य का वर्णन किया गया है। सूक्त में आध्यात्मिक धरातल पर विश्व ब्रह्मांड की एकता की भावना स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त हुई है। भारतीय संस्कृति में यह धारणा निश्चित है कि विश्व-ब्रह्मांड में एक ही सत्ता विद्यमान हैजिसका नाम रूप कुछ भी नहीं है ।
       ऋक् संहिता में १० मंडलबालखिल्य सहित १०२८ सूक्त हैं। वेद मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जाता हैजिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है। कात्यायन प्रभति ऋषियों की अनुक्रमणी के अनुसार ऋचाओं की संख्या १०५८०शब्दों की संख्या १५३५२६ तथा शौनक कृत अनुक्रमणी के अनुसार ४,३२,००० अक्षर हैं। ऋग्वेद की जिन २१ शाखाओं का वर्णन मिलता हैउनमें से चरणव्युह ग्रंथ के अनुसार पाँच ही प्रमुख हैंशाकलवाष्कल.आश्वलायनशांखायन और माण्डूकायन । ऋग्वेद में ऋचाओं का बाहुल्य होने के कारण इसे ज्ञान का वेद कहा जाता है। ऋग्वेद में ही मृत्युनिवारक त्र्यम्बक-मंत्र या मृत्युञ्जय मन्त्र (/५९/१२वर्णित है,ऋग्विधान के अनुसार इस मंत्र के जप के साथ विधिवत व्रत तथा हवन करने से दीर्घ आयु प्राप्त होती है तथा मृत्यु दूर हो कर सब प्रकार का सुख प्राप्त होता है। विश्वविख्यात गायत्री मन्त्र (ऋ० ३/६२/१०भी इसी में वर्णित है। ऋग्वेद में अनेक प्रकार के लोकोपयोगी-सूक्ततत्त्वज्ञान-सूक्तसंस्कार-सुक्त उदाहरणतः रोग निवारक-सूक्त (ऋ०१०/१३७/-),श्री सूक्त या लक्ष्मी सुक्त (ऋग्वेद के परिशिष्ट सूक्त के खिलसूक्त में), तत्त्वज्ञान के नासदीय-सूक्त (ऋ० १०/१२९/-तथा हिरण्यगर्भ-सूक्त (ऋ०१०/१२१/-१०और विवाह आदि के सूक्त (ऋ० १०/८५/-४७वर्णित हैंजिनमें ज्ञान विज्ञान का चरमोत्कर्ष दिखलाई देता है।
       यजुर्वेदः-ऋग्वेद के लगभग ६६३ मंत्र यथावत् यजुर्वेद में हैं। यजुर्वेद वेद का एक ऐसा प्रभाग हैजो आज भी जन-जीवन में अपना स्थान किसी न किसी रूप में बनाये हुऐ है। संस्कारों एवं यज्ञीय कर्मकाण्डों के अधिकांश मन्त्र यजुर्वेद के ही हैं। यजुर्वेदाध्यायी परम्परा में दो सम्प्रदाय-ब्रह्म सम्प्रदाय अथवा कृष्ण यजुर्वेदआदित्य सम्प्रदाय अथवा शुक्ल यजुर्वेद ही प्रमुख हैं। वर्तमान में कृष्ण यजुर्वेद की शाखा में ४ संहिताएँ -तैत्तिरीयमैत्रायणी.कठ और ४.कपिष्ठल कठ ही उपलब्ध हैं। शुक्ल यजुर्वेद की शाखाओं में दो प्रधान संहिताएँमध्यदिन संहिता और २काण्व संहिता ही वर्तमान में उपलब्ध हैं। आजकल प्रायः उपलब्ध होने वाला यजुर्वेद मध्यदिन संहिता ही है। इसमें ४० अध्याय१९७५ कण्डिकाएँ (एक कण्डिका कई भागों में यागादि अनुष्ठान कर्मों में प्रयुक्त होनें से कई मन्त्रों वाली होती है।तथा ३९८८ मन्त्र हैं। विश्वविख्यात गायत्री मंत्र (३६.तथा महामृत्युञ्जय मन्त्र (.६०इसमें भी है।
       सामवेदः- सामवेद संहिता में जो १८७५ मन्त्र हैंउनमें से १५०४ मन्त्र ऋग्वेद के ही हैं। सामवेद संहिता के दो भाग हैंआर्चिक और गान। पुराणों में जो विवरण मिलता है उससे सामवेद की एक सहस्त्र शाखाओं के होने की जानकारी मिलती है। वर्तमान में प्रपंच ह्रदय,दिव्यावदानचरणव्युह तथा जैमिनि गृहसूत्र को देखने पर १३ शाखाओं का पता चलता है। इन तेरह में से तीन आचार्यों की शाखाएँ मिलती हैं- (कौमुथीय, (राणायनीय और (जैमिनीय। सामवेद का महत्व इसी से पता चलता है कि गीता में कहा गया है कि -वेदानां सामवेदोऽस्मि। (गीता-अ० १०श्लोक २२)। महाभारत में गीता के अतिरिक्त अनुशासन पर्व में भी सामवेद की महत्ता को दर्शाया गया है-सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रीयम्। (म०भा०,अ० १४ श्लोक ३२३)। सामवेद में ऐसे मन्त्र मिलते हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि वैदिक ऋषियों को एसे वैज्ञानिक सत्यों का ज्ञान था जिनकी जानकारी आधुनिक वैज्ञानिकों को सहस्त्राब्दियों बाद प्राप्त हो सकी है। उदाहरणतःइन्द्र ने पृथ्वी को घुमाते हुए रखा है। (सामवेद,ऐन्द्र काण्ड,मंत्र १२१), चन्द्र के मंडल में सूर्य की किरणे विलीन हो कर उसे प्रकाशित करती हैं। (सामवेदऐन्द्र काण्डमंत्र १४७)। साम मन्त्र क्रमांक २७ का भाषार्थ हैयह अग्नि द्यूलोक से पृथ्वी तक संव्याप्त जीवों तक का पालन कर्ता है। यह जल को रूप एवं गति देने में समर्थ है। अग्नि पुराण के अनुसार सामवेद के विभिन्न मंत्रों के विधिवत जप आदि से रोग व्याधियों से मुक्त हुआ जा सकता है एवं बचा जा सकता हैतथा कामनाओं की सिद्धि हो सकती है। सामवेद ज्ञानयोगकर्मयोग और भक्तियोग की त्रिवेणी है। ऋषियों ने विशिष्ट मंत्रों का संकलन करके गायन की पद्धति विकसित की। अधुनिक विद्वान् भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि समस्त स्वरताललयछंदगतिमन्त्र,स्वर-चिकित्साराग नृत्य मुद्राभाव आदि सामवेद से ही निकले हैं।
       अथर्ववेदः- अथर्ववेद संहिता के बारे में कहा गया है कि जिस राजा के रज्य में अथर्ववेद जानने वाला विद्वान् शान्तिस्थापन के कर्म में निरत रहता हैवह राष्ट्र उपद्रवरहित होकर निरन्तर उन्नति करता जाता हैः-
यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः।
निवसत्यपि तद्राराष्ट्रं वर्धतेनिरुपद्रवम् ।। (अथर्व०-/३२/)
       भूगोलखगोलवनस्पति विद्याअसंख्य जड़ी-बूटियाँ,आयुर्वेदगंभीर से गंभीर रोगों का निदान और उनकी चिकित्सा,अर्थशास्त्र के मौलिक सिद्धान्तराजनीति के गुह्य तत्त्वराष्ट्रभूमि तथा राष्ट्रभाषा की महिमाशल्यचिकित्साकृमियों से उत्पन्न होने वाले रोगों का विवेचनमृत्यु को दूर करने के उपायप्रजनन-विज्ञान अदि सैकड़ों लोकोपकारक विषयों का निरूपण अथर्ववेद में है। आयुर्वेद की दृष्टि से अथर्ववेद का महत्व अत्यन्त सराहनीय है। अथर्ववेद में शान्ति-पुष्टि तथा अभिचारिक दोनों तरह के अनुष्ठन वर्णित हैं। अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहते हैं। चरणव्युह ग्रंथ के अनुसार अथर्व संहिता की नौ शाखाएँ.पैपलदान्तप्रदान्तस्नात.सौलब्रह्मदाबलशौनकदेवदर्शत और ९चरणविद्य बतलाई गई हैं। वर्तमान में केवल दो.पिप्पलाद संहिता तथा २शौनक संहिता ही उपलब्ध है। जिसमें से पिप्लाद संहिता ही उपलब्ध हो पाती है। वैदिकविद्वानों के अनुसार ७५९ सूक्त ही प्राप्त होते हैं। सामान्यतः अथर्ववेद में ६००० मन्त्र होने का मिलता है परन्तु किसी-किसी में ५९८७ या ५९७७ मन्त्र ही मिलते हैं।
       वेदाङ्गः (वेदार्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र)
       वेद समस्त ज्ञानराशि के अक्षय भंडार हैतथा प्राचीन भारतीय संस्कृति,सभ्यता एवं धर्म के आधारभूत स्तम्भ हैं। वेद धर्म,अर्थकाम और मोक्षइन चार पुरुषार्थों के प्रतिपादक हैं। वेद भी अपने अङ्गों के कारण ही ख्यातिप्राप्त हैंअतः वेदाङ्गों का अत्याधिक महत्व है। यहां पर अङ्ग का अर्थ है उपकार करनेवाला अर्थात वास्तविक अर्थ का दिग्दर्शन करानेवाला। वेदाङ्ग छः प्रकार के हैः-
(शिक्षा,
(कल्प,
(व्याकरण,
(निरुक्त,
(छन्द और
(ज्योतिष ।
()- शिक्षाः- स्वर एवं वर्ण आदि के उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो,उसे शिक्षा कहाजाता है। इसका मुख्य उद्येश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है।
()-कल्पः- कल्प वेद-प्रतिपादित कर्मों का भलीभाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसमें यज्ञ सम्बन्धी नियम दिये गये हैं।
()-व्याकरणः-वेद-शास्त्रों का प्रयोजन जानने तथा शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके अतः इसका अध्ययन आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में पाणिनीय व्याकरण ही वेदाङ्ग का प्रतिनिधित्व करता है। व्याकरण वेदों का मुख भी कहा जाता है।
()-निरुक्तः-इसे वेद पुरुष का कान कहा गया है। निःशेषरूप से जो कथित होवह निरुक्त है।इसे वेद की आत्मा भी कहा गया है।
()-छन्दः-इसे वेद पुरुष का पैर कहा गया है।ये छन्द वेदों के आवरण है। छन्द नियताक्षर वाले होते हैं। इसका उदेश्य वैदिक मन्त्रों के समुचित पाठ की सुरक्षा भी है।
()-ज्योतिषः-यह वेद पूरुष का नेत्र माना जाता है। वेद यज्ञकर्म में प्रवृत होते हैं और यज्ञ काल के आश्रित होते है तथा जयोतिष शास्त्र से काल का ज्ञान होता है। अनेक वेदिक पहेलियों का भी ज्ञान बिना ज्योतिष के नहीं हो सकता।

8 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं ई-गुरु राजीव हार्दिक स्वागत करता हूँ.

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  2. bahut hi vistrit jaankaari!dhanyawaad padhaane ke liye!

    kunwar ji,

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  3. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

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  4. मैं हिरण्यगर्भ की जानकारी चाह रहा था लेकिन यहां तो वेदों में सारी सामग्री मौजूद है । सभी भारतीयों को वेदों के बारे में शिक्ष्या दी जानी चाहिए।

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं