आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

शनिवार, 14 अगस्त 2010

बेटा ! अपनी माँ को माँ कहो - माँ को बेटे से मिलाते हिंदी ब्लोगर्स

बेटा !!! अपनी माँ को माँ कहो - यह शब्द सुनने में कितना अजीब लगेगा जब कि कोई बच्चा जो अपनी माँ को अच्छी तरह जानता हो, उससे ऐसा कहा जाए ! परन्तु आज वास्तविकता तो कुछ ऐसी ही है !

हिंदी भारत की राजभाषा है, आपको मानना भी पड़ेगा कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा है, हकीकत से कोसों दूर ! ऐसा इसलिए है कि राष्ट्रभाषा के पहचान के प्रति देशावाशी उदासीन हैं ! इसके अधिकाधिक प्रयोग के लिए भी प्रचार-प्रसार किये जा रहें हैं ! पर यह कुछ अजीब सा लगता है कि जो हमारी अपनी उसे अपनाने के लिए कहने की आवश्यकता है ! अब तो आप ( बेटा ! अपनी माँ को माँ कहो ) का यथार्थ समझ ही चुके होंगें !

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना जैसी पार्टियों ने स्वार्थ के वशीभूत होकर हद ही पर कर दी और माँ को माँ मानने से भी इनकार कर दिया ! वो तो भला हो हिंदी ब्लॉग लेखकों और पाठकों का जिनके कारण आज कई बेटे अपनी मातृभाषा ( माँ ) के करीब हैं, यदि दूर दृष्टि डाली जाए तो हिंदी को इस मकडजाल पर स्थापित करने का श्रेय हिंदी ब्लोगर्स का ही है ! भारत में सर्वप्रथम < वेबदुनिया > से हिंदी वेब लेखन की शुरुआत हुई जिसे आज हिंदी ब्लोगर्स ने संतोषजनक स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया है !


जहाँ तक मैंने व्यक्तिगत रूप से भारतीय भाषाओँ का अध्यनन किया है तो मैंने ऐसा महसूस किया संस्कृत आधारित हिंदी ही सभी भाषाओँ का मूल है ! गुजराती, बंगाली, आसमिया, मराठी, उड़िया, तेलगु, तमिल आदि भाषाओँ के साहित्य का अध्यनन किया जाए तो हर कदम पर हिंदी के ही शब्द सामने आयेंगे ! संबंधबोधक अव्यय और समुच्यबोधक अव्यय के भिन्नता के कारण ही इन भाषाओँ में अंतर प्रतीत होता है !

फिर वास्तव में समस्या क्या है ?

समस्या है संस्कृत आधारित हिंदी का अपने मूल रूप अपभ्रंशित हो जाना !
इस्लाम के आगमन के साथ ही भारत में दो नई भाषों का आगमन हुआ अरबी और फारसी, मगर ना तो भारत में अरबी ही चली और ना ही फारसी ! चलने का मतलब है कि ना अरबी ही भारतीयों के बोलचाल की भाषा के रूप में जगह बना पाई और ना ही फारसी !


धर्म के बाद भाषा द्वारा ही किसी राष्ट्र के राष्ट्रिकों को एक सूत्र में पिरोने का काम होता है ! मुस्लिम शासक यह बात अच्छी तरह जानते थे कि धर्म अथवा भाषा में परिवर्तन के बिना शासन करना लगभग असंभव ही है, सो कार्य आरम्भ हुआ धर्मांतरण और भाषा परिवर्तन का !

तलवार और क़ानून के नाम पर धर्मांतरण आरम्भ हो गया ! तलवार ने तो शायद जितने इस्लाम समर्थक खड़े किये उससे भी अधिक विद्रोही जैसे - राजपूत और सिख और मराठे जिन्होंने इस्लामी राज्य को कमजोर करने में कोई कसार ना छोड़ी ! कानून शासक का सबसे बड़ा हथियार है सो उसका भी प्रयोग किया गया, जजिया नाम का कर (टैक्स) गैर मुस्लिमों पर थोप दिया गया, कर राज्य कल्याण के लिए होतें हैं परन्तु, जजिया वास्तव में राज्य की प्रगति के लिए नहीं इस्लाम की प्रगति के लिए वसूला जाने वाला टैक्स था ! ऐसे में अधिकतर लोगों ने जजिया कर से मुक्ति पाने के लिए इस्लाम स्वीकार किया और मुस्लिम बन गए !

अब बात करते हैं भाषा की, किसी मुस्लिम शासक ने अरबी को राज-काज की भाषा के रूप में प्रयोग किया तो किसी ने फारसी को ! अरबी और फारसी का चलन इस कारण बड़ी तेजी से भारतीय उच्च वर्ग तथा पढ़े लिखे लोगों के बीच हुआ, परन्तु भारत के साधारण और पिछड़े जनों के बीच ये दोनों भाषाएँ अत्यधिक लोकप्रिय ना हो सकी और साधारण जन अपनी स्थानीय भाषा का ही प्रयोग करते रहे, इससे एक खीच तान शुरू हुई और एक नई भाषा का जन्म हुआ जिसे हम उर्दू कहते हैं ! इस उर्दू ने हिंदी कि नैया आधी डूबा कर छोड़ दी ! इस उर्दू के कारण ही भारत के अन्य राज्य हिंदी से दूर भागने लगे !

मैकाले साहब और उनकी अंग्रेजी ने तो हिंदी की क्या दशा की है, कहने की आवश्यकता ही नहीं है ! जिसे देखो अंग्रेजी की रट लगा रखी है ! पूरे देश का पैसा इन अंग्रेजों की नाजायज संतानों के पास ही सिमट गया है !

लगभग १००० वर्षो की भाषा की गुलामी हम झेल रहें हैं और और केवल मुट्ठी भर लोगों के चले जाने और अपने घर के बंटवारे के बुरे दिन को आज हम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मान कर उत्त्साहित हो रहें ! हमसे छोटी -छोटी बातें नहीं सही जाती पर १००० वर्षों की गुलामी को हम आज भी हंस गा कर सह रहें है !

इस १००० वर्षों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए आप क्या सुझाव देंगे !!

प्रस्तुतकर्ता - पंकज सिंह राजपूत

!!! बस एक ही धुन जय-जय भारत !!!

1 टिप्पणी:

  1. लगभग १००० वर्षो की भाषा की गुलामी हम झेल रहें हैं और और केवल मुट्ठी भर लोगों के चले जाने और अपने घर के बंटवारे के बुरे दिन को आज हम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मान कर उत्त्साहित हो रहें ! हमसे एक छोटी -छोटी बातें नहीं सही जाती पर १००० वर्षों की गुलामी को हम आज भी हंस गा कर सह रहें है !

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं