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सोमवार, 7 नवंबर 2011

मैं खुदा हूँ - इस्लाम और वैदिक अद्वैतवाद (सूफीवाद के परिपेक्ष्य में)


सूफीवाद में समय-समय पर कुछ हिला देने वाले विचारक भी पैदा हुए! जिन्होंने इस्लाम में वैदिक अद्वैत को पुष्ट करने की कोशिश की !

सूफी परम्परा का आरम्भ हसन (६४२-७२८) जो की बसरा (ईराक) में हुए, उनके द्वारा हुआ! हसन उम्मया शासकों के खिलाफ थे और उनकी शान-शौकत भरी जीवन शैली से नफ़रत करते थे!
हसन के बाद एक मशहूर नाम अबू हाशिम (मृत्यु: ७७६) का है, जो कूफा (ईराक) में रहते थे!

बायजीद बिस्तामी (मृत्यु: ८७४) ने इस्लामिक नेताओं को, और पैगम्बर के नाम पर मौज करने वालों को खुली चुनौती दे दी ! उन्होंने तौहीद (Monotheism/एकेश्वरवाद) को एक क्रांतिकारी रूप दे दिया! उनके तौहीद के सिद्धांत में प्रेमी और प्रेमिका दोनों एक हो गए! उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि, इब्राहीम, मूसा, और मोहम्मद मैं हूँ और जो भी ईश्वर के प्रेम में डूब कर फना (मिट) हो गया वही ईश्वर है!! 
इस प्रकार बायजीद ने उपनिषदों के सार को इस्लाम के सम्मुख रखा, परन्तु डरे हुए और लोभी इस्लामिक नेताओं ने उनकी बातों को सिरे से नकार दिया! इस विषय पर कबीर का भी मत है कि यदि आप उस अलख(जो दीखता नहीं है) उसे देखना चाहते हो तो उसे संतों के रूप में देखों! क्योंकि वह अपने भक्तों के ह्रदय में बसता है !!

सबसे अधिक चौंका देने वाला, साहस की सीमायें तोडने वाला और इस्लामी क़ानून को चुनौती देने वाला एक प्रसिद्द नाम है - हुसैन बिन मनसूर अल-हल्लाज (AL-HALLAJ) का !!
उनका जन्म ईरान में अल-तूर में ८५७ में हुआ ! एक दिन उन्होंने उन शब्दों का प्रयोग किया जिसके कारण वह आज भी जाने जाते हैं, इस्लाम का इतिहास पढने वाले इस नाम को अच्छी तरह जानते हैं! साहित्यकारों ने भी इनके शब्दों का खूब प्रयोग किया है! 
उनके  शब्द उनके लिए मौत का कारण बन गए -  ९१३ में उनकों जेल में डाल दिया गया, प्रताड़ित भी किया गया, तौबा करने को कहा गया, परन्तु जो इस मिटटी के शरीर को मिथ्या मान चुका हो उस पर यातनाओं का क्या प्रभाव पडना था, इसलिए बाद में अल ह्ल्लाज को २६ मार्च ९२२ से सलीब पर चढ़ा दिया गया गया (बहुत कुछ ईसा कि तरह)!!
अब  आप सोच रहें होंगे कि आखिर अल-हल्लाज  ने ऐसा कहा क्या था, जो उन्हें इतने दुःख झेलने पड़े! जानते हैं क्या कहा था उन्होंने, बस केवल इतना ही [अन-अल-हक अर्थात मैं परम सत्य हूँ] - बस एक छोटा सा वेदान्तिक वाक्य !!!

मनसूर अल-हल्लाज ने परिपूर्ण मनुष्य (Perfect Human Being) का विचार पेश किया - जो कि योग साधना द्वारा संभव है!! उनके इंसान में दैवी तत्त्व इस तरह मिल गया है, जिस तरह शराब में पानी, समुद्र में नदियाँ! दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि दैवी शक्ति और मनुष्य दोनों एक अंग हो गए हैं और इसी कारण मनसूर अल-हल्लाज ने "" मैं खुदा हूँ या "" मैं इश्वर हूँ"" कहकर यह बता दिया कि भगवान जब इंसान के choले में प्रवेश कर जाता है तो वह इस तरह घुल मिल जाता है कि दोनों का अंतर मिट जाता है! 

इसी सिद्धांत का मूल सार यह है कि अल्लाह एक अलग इकाई नहीं है, बल्कि वह सर्वव्यापक है और इंसान उसी की परछाई है, उसी का ही एक अंग है! दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि खुदा और इंसान की एक अटूट एकता है जो एक दूसरे में घुले हुए हैं, अलग नहीं हैं!
इस सिद्धांत की दूसरी महत्वपूर्ण बात जो इब्न अरबी (इस सिद्धांत के प्रचारक)  ने कही है - कोई भी धर्म भगवान को अपनी जागीर नहीं बना सकता! 

इब्न अरबी कहतें है कि लोग ईश्वर के बारे में भिन्न-भिन्न मत रखते हैं, लेकिन मैं सबको ठीक समझता हूँ, जिस पर उनका विश्वास है !!!

व्यक्तिगत रूप से इब्न अरबी के मत का समर्थन करता हूँ !! और आप ?

प्रस्तुतकर्ता - पंकज सिंह राजपूत

!!! बस एक ही धुन जय-जय भारत !!!

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