आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

जानने योग्य कौन है ?


जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है, न बाहर की ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञानघन है, न जानने वाला है, न नहीं जानने वाला है, जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहार में नहीं आ सकता है, जो पकड़ने में नहीं आ सकता है, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्नतन करनेमें नहीं आ सकता, जो बतलाने में नहीं आ सकता, एकमात्र आत्मा की प्रतीति ही जिसका सार है, जिसमें प्रपंच का सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शांत, कल्याणमय, अद्वितीय, तत्व परब्रह्म परमात्मा का चतुर्थ पाद (पैर अथवा अंग) है, इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी मानते हैं ! वह परमात्मा है, वह जानने योग्य है, केवल वही जानने योग्य है !

ॐ शांति: शांति: शांति: !!!

मांडूक्योपनिषद (७)

यदि देशभक्ति पाप है तो, मैं जानता हूँ...

यदि देशभक्ति पाप है तो  मैं  जानता हूँ, मैंने पाप किया है ! यदि प्रशंसनीय है तो मैं अपने आपको उस प्रशंसा का अधिकारी समझता हूँ ! मुझे विश्वास है की मनुष्यों के द्वारा स्थापित न्यायालय के ऊपर कोई न्यायायल हो तो उसमें मेरे काम को अपराध नहीं समझा जाएगा ! मैंने देश और जाति की भलाई के लिए यह काम किया ! मैंने उस व्यक्ति पर गोली चली जिसकी नीतियों के कारण हिन्दुओं पर घोर संकट आये और हिन्दू नष्ट हुए !!

         नथुराम गोडसे

रविवार, 3 अक्तूबर 2010

सत्य के प्रयोग (आत्मकथा)

मैं चाहता हूँ कि मुझे यह प्रकरण न लिखना पड़ता । लेकिन इस कथा में मुझको ऐसे कितने कड़वे घूंट पीने पड़ेंगे । सत्य का पुजारी होने का दावा कर के मैं और कुछ कर ही नहीं सकता । यह लिखते हुए मन अकुलाता हैं कि तेरह साल की उमर में मेरा विवाह हुआ था । आज मेरी आँखो के सामने बारह-तेरह वर्ष के बालक मौजूद हैं। उन्हें देखता हूँ और अपने विवाह का स्मरण करता हूँ तो मुझे अपने ऊपर दया आती हैं और इन बालकों को मेरी स्थिति से बचने के लिए बधाई देने की इच्छा होती हैं । तेरहवें वर्ष में हुए अपने विवाह के समर्थन में मुझे एक भी नैतिक दलील सूझ नहीं सकती । ---------------------................................
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वह पहली रात ! दो निर्दोष बालक अनजाने संसार-सागर में कूद पड़े । भाभी ने सिखलाया कि मुझे पहली रात में कैसा बरताब करना चाहिये । धर्मपत्नी को किसने सिखलाया, सो पूछने की बात मुझे याद नहीं ।