आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

रविवार, 3 अक्तूबर 2010

सत्य के प्रयोग (आत्मकथा)

मैं चाहता हूँ कि मुझे यह प्रकरण न लिखना पड़ता । लेकिन इस कथा में मुझको ऐसे कितने कड़वे घूंट पीने पड़ेंगे । सत्य का पुजारी होने का दावा कर के मैं और कुछ कर ही नहीं सकता । यह लिखते हुए मन अकुलाता हैं कि तेरह साल की उमर में मेरा विवाह हुआ था । आज मेरी आँखो के सामने बारह-तेरह वर्ष के बालक मौजूद हैं। उन्हें देखता हूँ और अपने विवाह का स्मरण करता हूँ तो मुझे अपने ऊपर दया आती हैं और इन बालकों को मेरी स्थिति से बचने के लिए बधाई देने की इच्छा होती हैं । तेरहवें वर्ष में हुए अपने विवाह के समर्थन में मुझे एक भी नैतिक दलील सूझ नहीं सकती । ---------------------................................
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वह पहली रात ! दो निर्दोष बालक अनजाने संसार-सागर में कूद पड़े । भाभी ने सिखलाया कि मुझे पहली रात में कैसा बरताब करना चाहिये । धर्मपत्नी को किसने सिखलाया, सो पूछने की बात मुझे याद नहीं ।
पूछने की इच्छा तक नहीं होती । पाठक यह जान ले कि हम दोनों एक-दूसरे से डरते थे, ऐसा भास मुझे हैं । एक-दूसरे से शरमाते तो थे ही । बातें कैसे करना, क्या करना, सो मैं क्या जानूँ? प्राप्त सिखापन भी क्या मदद करती? लेकिन क्या इस सम्बन्ध में कुछ सिखाना जरुरी होता हैं? यहाँ संस्कार बलबान हैं, वहाँ सिखावन सब गैर-जरुरी बन जाती हैं । धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को पहचानने लगे, बोलने लगे । हम दोनों बराबरी की उमर के थे । पर मैने तो पति की सत्ता चलाना शुरू कर दिया ।
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बिना आत्मशुद्धि के जीवन मात्र के साथ ऐक्य सध ही नही सकता । आत्मशुद्धि के बिना अहिंसा-धर्म का पालन सर्वधा असंभव है । अशुद्ध आत्मा परमात्मा के दर्शन करने मे असमर्थ है । अतएव जीवन-मार्ग के सभी क्षेत्रो मे शुद्धि की आवश्यकता है । यह शुद्धि साध्य है , क्योकि व्यष्टि और समष्टि के बीच ऐसा निकट सम्बन्ध है कि एक की शुद्धि अनेको की शुद्धि के बराबर हो जाती है । और व्यक्तिगत प्रयत्न करने की शक्ति तो सत्य-नारायण ने सबको जन्म से ही दी है ।

लेकिन मै प्रतिक्षण यह अनुभव करता हूँ कि शुद्धि का मार्ग विकट है । शुद्ध बनने का अर्थ है मन से, वचन से और काया से निर्विकार बनना , राग-द्वेषादि से रहित होना । इस निर्विकारता तक पहुँचने का प्रतिक्षण प्रयत्न करते हुए भी मै पहुँच नहीं पाया हूँ , इसलिए लोगो की स्तुतु मुझे भुलावे मे नही डाल सकती । उलटे, यह स्तुति प्रायः तीव्र वेदना पहुँचाती है । मन के विकारो को जीतना संसार को शस्त्र से जीतने की अपेक्षा मुझे अधिक कठिन मालूम होता है । हिन्दुस्तान आने के बाद भी अपने भीतर छिपे हुए विकारो को देख सका हूँ , शरमिन्दा हुआ हूँ किन्तु हारा नही हूँ । सत्य के प्रयोग करते हुए मैने आनन्द लूटा है , और आज सभी को लूटा रहा हूँ । लेकिन मै जानता हूँ कि अभी मुझे विकट मार्ग तय करना है । इसके लिए मुझे शून्यबत् बनना है । मनुष्य जब तक स्वेच्छा से अपने को सबसे नीचे नही रखता , तब तक उसे मुक्ति नही मिलती । अहिंसा नम्रता की पराकाष्ठा है और यह अनुभव-सिद्ध बात है कि इस नम्रता के बिना मुक्ति कभी नही मिलती । ऐसी नम्रता के लिए प्रार्थना करते हुए और उसके लिए संसार की सहायता की याचना करते हुए इस समय तो मै इन प्रकरणों को बन्द करता हूँ ।

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