आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

बुधवार, 24 नवंबर 2010

खैर चिंता छोडिये - प्रतुल जी

प्रतुल जी बकरे की आत्मकथा ऊपरवाले से प्यार करने वालों के लिए है -
क्योंकि जिससे हम प्यार करते हैं उसकी सृजित हर वस्तु हमें प्यारी होती है - कम से कम चटोरेपन के लिए तो हम उसकी सृजित वस्तु को नष्ट नहीं कर सकते ---

उनको क्या ? जिनमें संवेदना ही शून्य हो चुकी है -
उनको क्या ? जो उस परमात्मा को एक व्यक्तित्व समझते हैं, जो मूर्ख मनुष्यों की भांति इच्छा पूरी होने प्रसन्न होता हैं और इच्छा पूरी न होने पर खिन्न होता है, जो ईर्ष्यालु है ! 

खैर चिंता छोडिये !!! हम, आप और वो बकरा बेचारा और उसके अन्य  चौपाये, दोपाये साथी आखिर भारत जैसे गरीब देश में पैदा हुए हैं - 
जी. डी. पी. में आखिर मांस व्यापार और चमडा व्यापार 

सोमवार, 22 नवंबर 2010

ब्लॉग युद्ध - अमित बनाम अनवर जमाल


ये ब्लॉग युद्ध लड़ा जा रहा  है उस देश में जहाँ 45 लाख का एक बकरा बिकता है, बकरों का 3-4 लाख में बिकना भी यहाँ कोई बड़ी बात नहीं है, ध्यान दीजिये उस देश में जहाँ आज भी हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है !
पात्र परिचय -
हिंदी ब्लॉग एक आसमान पर चमकते हुए एक सितारे का नाम है डा. अनवर जमाल !
नाम तो आप सभी को पता ही होगा और काम भी पता होगा !
उन्होंने हिन्दुओं को उनकी धार्मिक कुरूतियों से अवगत कराने के लिए और इस्लाम की सार्थकता जताने के लिए एक ब्लॉग शुरू किया वेद-कुरान, ब्लॉग काफी उन्नत है, मैं भी उसका और उनका मुरीद हूँ ! आखिर अदा ही साहब की कुछ ऐसी है, रोज १०-२० लोग उनकी तारीफ करने के लिए उनके ब्लॉग पर आते हैं तो कुछ गलियां देने के लिए !!!

रविवार, 21 नवंबर 2010

जगत की भ्रमरूपता


यह जगत संकल्प के निर्माण, मनोराज्य के विलास, इंद्रजाल द्वारा रचित पुष्पहार, कथा-कहानी के अर्थ के प्रतिभास, वातरोग के कारण प्रतीत होने वाले भूकंप, बालक को डराने के लिए कल्पित पिशाच, निर्मल आकाश में कल्पित मोतियों के ढेर, नाव के चलने से तथा प्रतीत होनेवाली वृक्षों की गति, स्वप्न में देखे गए नगर, अन्यत्र देखे गए फूलों के स्मरण से आकाश से आकाश में कल्पित हुए पुष्प की भांति भ्रम द्वारा निर्मित हुआ है !

मृत्युकाल में पुरुष स्वयं अपने हृदय में इसका अनुभव करता है ! (यहाँ मृत्यु से अभिप्राय शरीरांत नहीं है) 
इस प्रकार जगत मिथ्या होने पर भी चिरकाल तक अत्यंत परिचय में आने के कारण घनिभाव(दृढ़ता) को प्राप्त होकर जीव के हृदयाकाश में प्रकाशित हो बढ़ने लगता है ! यह क्षेत्र इहलोक कहलाता है ! जन्म से लेकर मृत्यु तक की चेष्टाओं तथा मरण आदि का अनुभव करने वाला जीव वहीँ (हृदयाकाश में ही) इहलोक की कल्पना करता है, जिसको पहले भी बताया गया है ! फिर मरने (शरीर का अंत) के अनन्तर वह वहीँ परलोक की कल्पना करता है ! 
वासना के भीतर अन्य अनेक शरीर और उनके भीतर भी दूसरे-दूसरे, भिन्न-भिन्न शरीर - 
--- ये इस संसार में केले के वृक्ष की त्वचा (छिलके या वल्कल) के सामान एक के पीछे एक प्रतीत होते हैं ! 
न तो पृथ्वी आदि पञ्च-महाभूतों के समुदाय हैं और न जगत की सृष्टि का कोई क्रम ही है ! यह विभिन्न रूप दिखने वाले सब के सब मिथ्या हैं ! तथापि मृत और जीवित जीवों को इनमे संसार का भ्रम होता है ! यह अविद्या विभिन्न धाराओं में फैलती है ! मूढ़ पुरूष के लिए यह इतनी विशाल है की, वे इसे पार नहीं कर सकते ! सृष्टिरुपी चंचल तरंगो से ही यह अविद्या तरंगवती जान पड़ती है और संसार यथावत जान पड़ता है !

जबकि सच तो इतना ही है - यहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नाही
                                                                                
                                                          श्री योगवाशिष्ठ महारामायण 

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई ... (2)
जहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नाही .... (2)

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई ... (2)

पता जब लगा मेरी हस्ती का मुझको ....
पता जब लगा मेरी ..
पता जब लगा मेरी हस्ती का मुझको...(2)
सिवा मेरे अपने कहीं कुछ नाही ....(2)
मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आ ..आ ...आई ..(2)

सभी में सभी में पड़ा मैं ही मैं हूँ ...(3)
सिवा मेरे अपने कहीं कुछ नाही....(2)


मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आ ..आ ...आई ...(2)
मुझे मेरी मस्ती ....

न दुःख है न सुख है, ना है शोक  कुछ भी .....
अजब है ये मस्ती (2) या कुछ नाही ..

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई ...(4)

ये सागर ये लहरें ये फेन ये बुदबुदे ..... (2)
कल्पित है (2) जल के सिवा कुछ नाही ...(2)

मुझे मेरी मस्ती कहा लेके आई ...(4)
मैं हूँ आनंद, आनंद हैं ये मेरा ......
भ्रम है, ये द्वन्द है, मुझाको हुआ  है ...(2)
हटाया जो उसको खफा कुछ नाही ,,,,,

मुझे मेरी मस्ती कहा लेके आई ...(4)

ये पर्दा है दुई का,हटा कर जो देखा ... (2)
तो बस एक मैं हूँ .... (3), जुदा कुछ नाही ...

मुझे मेरी मस्ती कहा लेके आई ...(4)


mujhe meri masti kaha leke aayi by narayan swami

नारायण स्वामी की आवाज में ये भजन   <<<<<<  DOWNLOAD >>>>>>