आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

सोमवार, 22 नवंबर 2010

ब्लॉग युद्ध - अमित बनाम अनवर जमाल


ये ब्लॉग युद्ध लड़ा जा रहा  है उस देश में जहाँ 45 लाख का एक बकरा बिकता है, बकरों का 3-4 लाख में बिकना भी यहाँ कोई बड़ी बात नहीं है, ध्यान दीजिये उस देश में जहाँ आज भी हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है !
पात्र परिचय -
हिंदी ब्लॉग एक आसमान पर चमकते हुए एक सितारे का नाम है डा. अनवर जमाल !
नाम तो आप सभी को पता ही होगा और काम भी पता होगा !
उन्होंने हिन्दुओं को उनकी धार्मिक कुरूतियों से अवगत कराने के लिए और इस्लाम की सार्थकता जताने के लिए एक ब्लॉग शुरू किया वेद-कुरान, ब्लॉग काफी उन्नत है, मैं भी उसका और उनका मुरीद हूँ ! आखिर अदा ही साहब की कुछ ऐसी है, रोज १०-२० लोग उनकी तारीफ करने के लिए उनके ब्लॉग पर आते हैं तो कुछ गलियां देने के लिए !!!
तो ये है जनाब का सूक्ष्म परिचय, वैसे साहब का व्यक्तित्व विशाल है, पर आज बस इतना ही !! मुझे भी ब्लोगिंग तक लाने का श्रेय उन्ही को जाता है !!
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तो दूसरे प्रमुख पात्र हैं, हमारे बड़े भाईसाहब अमित शर्मा जीव्यक्तित्व के विषय में आप सभी जानते ही हैं - सरल और सौम्य !
बातों-बातों में विपक्षी को लपेट देतें है, और उसे पता भी नहीं चलता ! अपने ज्ञान का ढिंढोरा भी नहीं पिटते क्योंकि वे जानते हैं,की उनके पास विशाल समुद्र की कुछ बूंदे ही हैं ! 
ब्लोगिंग की जगह व्यक्तित्व सुधार की शिक्षा हमने इन्ही से प्राप्त की है !!

बाकी पात्र स्वयं ही अपना परिचय दे देंगे !!

अब युद्ध के कारणों पर  विस्तार से चर्चा करते हैं - 
जमाल साहब अपने ब्लॉग पर इस विद्वत्ता के साथ हिन्दुओं पर आपेक्ष करते हैं, कि भोला-भोला हिन्दू तो फंस ही जाये, और यही सोचता रह जाए की गलत क्या है और सही क्या है ?
वैसे साहब वेदों और पुराणों के विशेषज्ञ हैं परन्तु दृष्टि आलोचनात्मक है 0_0


अब कोई किसी के समाज के प्रति, धर्म के प्रति उलट-सुलट बोले तो कहाँ किसी से सहन होता है - झगड़ा तो होना ही है !
तो ये युद्ध साल भर पहले से ही आरम्भ हो गया था, योद्धा बदलते रहे, युद्ध चलता रहा (वैसे मेरे दृष्टिकोण ऐसा युद्ध संसार भर में निरंतर चले तो रक्त-पात की नौबत ही न आये) परन्तु विषयक दोनों योद्धा निरंतर संघर्ष जारी रखे हुए हैं !

कहीं अनवर जी भारी पड़ते दिखे (लेकिन सिर्फ कहीं-कहीं) तो अमित जी दिन पर दिन भारी पड़ते 
गए !

अमित जी को हाल ही में आनंद पाण्डेय जैसे काबिल साथियों का साथ मिल गया है, तो वहीँ जमाल साहब के सलीम खान और शाह नवाज जैसे साथी गायब से हो गएँ हैं !! 

पहले जमाल साहब वेदों को इस्लाम के सन्दर्भ में रख कर मांसाहार (गौ हत्या को अल्लाह-हू-अकबर.नेट पर) को वैदिक धर्म के अनुकूल बता  रहे थे !!
परन्तु वेदों वाला मोर्चा हार जाने पर रामायण के नाम पर मोर्चा तैयार किया है -

जमाल साहब पढ़े-लिखे हैं फिर भी गवारों वाले कुछ मोर्चे तैयार कर लिए, जैसे -

जमाल साहब का प्रहार - 

जैन और बुद्ध धर्म से पहले हमारी भारतीय संस्कृति में मांसाहार और इस्लाम से मिलती-जुलती सारी 
व्यवस्थाएं थी !!!
वर्तमान में हिन्दू भाइयों की दृष्टि में कुरबानी करना धार्मिक रीति तो क्या, घोर पाप है, परंतु अतीत में बौद्धों और जैनियों के प्रभाव से पूर्व ऐसी किसी धारणा का अस्तित्व न केवल नहीं था बल्कि हिन्दू ग्रंथों में आज भी कुरबानी और मांस भक्षण का उल्लेख मौजूद है। 

आखिर हम भी अमित भाईसाहब के दल के ही सिपाही हैं, सो गवारों वाला मोर्चा संभालने के लिए ये गंवार ही आगे आ गया है - 

हमारा प्रति-उत्तर - 

साहब ये जैन धर्म और बौद्ध धर्म इस्लाम की तरह आसमानी तो हैं नहीं ?
और इनका जन्म भी इस्लाम से पूर्व हमारे वैदिक धर्म से ही हुआ है, इनके दर्शन भी वेदांत से ही प्रभावित हैं और विद्वान् इन्हें कोई अलग धर्म ना मान कर हिन्दू (वैदिक) धर्म की ही शाखाएं मानतें हैं ! अब आपको इनका ज्ञान होगा नहीं क्योंकि ना तो दलाई लामा के साहित्य ही आपने पढ़े होंगे और ना तरुण सागर के !!1

जमाल साहब का प्रहार - 
अंहिंसा - करोड़ों जीवाणुओं की हम हत्या किये बिना नहीं रह सकते हैं ! और हिन्दू भी ऐसा करते हैं, जबकि हिन्दू शास्त्रों में हिंसा पाप है, जबकि इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है इसलिए इस्लाम इस मामले अच्छा है ! क्योकि इस्लाम जीव हिंसा की अनुमति देता है !!


हमारा प्रति उत्तर - 

जमाल साहब डॉक्टर पता नहीं आप किस विषय के हैं पर, एक बात तो तय है की विज्ञानं के तो बिलकुल नहीं हैं, नहीं तो ऐसी आठवी क्लास वाली बात कभी न करते -

जीव क्या है?

जिसमे जीवन है वही जीव है !

अब अनवर साहब  हम आपको पढ़ते हैं - 

 कोशिका विज्ञानं (Cytology ) -

कोशिका जीवन धारियों की रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है ! जीवन का आरम्भ होता है कोशिकाओं (cell ) से, संसार के प्रत्येक जीव में कोशिकाओं का समूह जरूर होगा, शरीर होने का अर्थ है कोशिकाओं का होना, जीवित होने का और  जीव होने का अर्थ है कोशिकाओं का होना !

इतना तो समझ आ ही गया होगा -

अब बात करते हैं उन जीवों की जिनके प्रति आपके मन में बड़ी दया है - 

ये अत्यंत सूक्ष्म परजीवी होते हैं - इनकी कोई कोशिकीय संरचना नहीं होती है, ये स्वतंत्र अवस्था में निष्क्रिय होते हैं तथा जंतुओं की जीवित कोशिकाओं पर बढ़ते हैं ! ठीक उसी तरह जैसे गेंहूँ का दाना जिसमे न तो जीवन होता है ना जीवन के लक्षण, फिर भी अनुकूल दशाएं प्राप्त होने पर उसमें से जीवन के अंकुर निकल आते हैं !!!

 
जमाल साहब का प्रहार - 

ऐसे भूखमरी के दौर में जब भारत का हर दूसरा बच्चा कुपोषित है, यज्ञ और हवन आदि के नाम पर अन्न और घी बर्बाद करने की क्या आवश्यकता है - 

हमारा प्रति उत्तर - 


फिर आप लोगों ने तो हद ही पार कर दी है - 45 लाख तक बकरे तो आप ईद के दिन वाहवाही लूटने के लिए खरीद लेते हो, जबकि उसी दिन हमारे ही किसी  मुसलमान भाई के घर में खाने को कुछ नहीं होता !!!

वाह भाई वाह - चटोरेपन और हेकड़ी को धर्म का नाम देना कोई आप से सीखे - 


अन्य प्रहारों के प्रति उत्तर भी जल्दी ही दे दिए जायेंगे !!!!

6 टिप्‍पणियां:

  1. आप लम्पटों को कुछ अधिक ही भाव दे रहे हैं......

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  2. मेरी यह टिप्पणी शायद आप सब को विषय से हट के लगे लेकिन ऐसा है नहीं. सवाल और जवाब का कोई अंत नहीं. एक सवाल पे कई सवाल उठाए जा सकते हैं और किसी भी जवाब को काटा जा सकता है क्योंकि सत्य एक होता है ज्ञानी अपने ज्ञान के अनुसार उसे बताता है. सब का ज्ञान एक जैसा नहीं होता.आज एक ओर बड़ी बड़ी दावतों; अमीर, खाना शान ओ शौकत दिखाने के लिए ,ज़रा सा खा के बाकी फैकने के लिए छोड़ दिया करता है; वही दूसरी और ग़रीब दाने दाने को तरसता रहता है. क्या हम कभी सोंचते हैं की यह दाना उस भूखे ग़रीब के लिए कितना कीमती है? एक ओर अमीर के पास १०-१० घर; हैं और रहता केवल एक घर मैं है. दूसरी और ग़रीब लू धुप, वर्षा, आंधी मैं एक छत; के लिए तरसता है. क्या जब हम अपने वातानुकूलित घर मैं आराम से सोते हैं,तो क्या सोंचते हैं कभी उस ग़रीब के बारे मैं जो सर्द रात मैं, और बारिश मैं कांप के रात गुज़ार देता है और दिन मैं फिर मजदूरी पे चला जाता है?

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  3. bahut khoobsurat......kya.......jabab.....gawaron
    ke liye..........


    pranam

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  4. पंडित जी लम्मपट संज्ञा भी कुछ लोगों के लिए छोटी संज्ञा ही है, अभी तक तो यहाँ आये भी नहीं है वो -----

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  5. बिलकुल सही कहा आपने,अपने जमाल भाई साहब तो है ही कमाल भाई साहब!मेरी ब्लॉग्गिंग कि शुरुआत में उन्होंने मुझे भी बहुत कुछ सिखाया और अमित भाई साहब ने तो ब्लॉग्गिंग ही उनको सही राह दिखाने के लिए शुरू की थी!पर वो तो वो है जो सोचते है की वो जिस राह पर चलते है वो ही ठीक है!



    पर मैंने कही एक बात सुनी थी कि "जो सो रहा होता है उसे तो आवाज देकर या बुला कर जगा लो,पर जो जागा हुआ ही ही और जानबूझ कर आँख मींचे पड़ा हो वो तो आवाज से नहीं उठेगा,जागे हुए को क्या जगाना"

    कुंवर जी,

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  6. Are bhai logo to kya hua, abhi -do din pahle ki bat hai, Anwar saheb ab Ved-Kuran par likhna band karne wale hain,

    Aur ek bat kunye ka medhak kya jane ki samudra kya hota hai, Amit ji ko hamari mubarakbad

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं