आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

बुधवार, 24 नवंबर 2010

खैर चिंता छोडिये - प्रतुल जी

प्रतुल जी बकरे की आत्मकथा ऊपरवाले से प्यार करने वालों के लिए है -
क्योंकि जिससे हम प्यार करते हैं उसकी सृजित हर वस्तु हमें प्यारी होती है - कम से कम चटोरेपन के लिए तो हम उसकी सृजित वस्तु को नष्ट नहीं कर सकते ---

उनको क्या ? जिनमें संवेदना ही शून्य हो चुकी है -
उनको क्या ? जो उस परमात्मा को एक व्यक्तित्व समझते हैं, जो मूर्ख मनुष्यों की भांति इच्छा पूरी होने प्रसन्न होता हैं और इच्छा पूरी न होने पर खिन्न होता है, जो ईर्ष्यालु है ! 

खैर चिंता छोडिये !!! हम, आप और वो बकरा बेचारा और उसके अन्य  चौपाये, दोपाये साथी आखिर भारत जैसे गरीब देश में पैदा हुए हैं - 
जी. डी. पी. में आखिर मांस व्यापार और चमडा व्यापार का लगभग १५ हजार करोड़ का योगदान है --- जब तक भारत में दूध का उत्पादन शून्य ना हो जाए तब तक तो ये बकरा बीती चलता ही रहेगा !!!!

देश की प्रगति में वो बकरा बेचारा और उसके अन्य  चौपाये, दोपाये साथी जितना योगदान कर रहें हैं उतना तो कोई और शायद ही कर रहा होगा !!! 
निस्वार्थ सेवा !!
वीरता के चक्र तो मरणोपरांत इन्हें भी मिलने चाहिए !!!!!

इन सभी निष्काम सेवाव्रतियों को जिन्होंने प्राण देकर मेरे देश की प्रगति में योगदान दिया - 
मेरा सत-सत नमन !!!!1

4 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तूतिकरण,आभार

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  2. ..

    प्रिय बन्धु,
    आपने मुझे अकारण महत्व दिया. मैंने जो कथा टाइप की है वह श्रीमान गोपीनाथ अग्रवाल जी द्वारा रचित है. मैं तो मात्र प्रकाशक हूँ. उनकी ये कथा मुझ पर वर्षों से रखी थी. और उचित समय का इंतज़ार कर रही थी. गोपीनाथ जी कौन हैं क्या कर रहे हैं मैं स्वयं भी नहीं जानता लेकिन उनकी इस रचना में मैं स्वानुभूत पीड़ा पाता हूँ.

    ..

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं