आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

लाला लाजपतराय - भारत की आजादी के आन्दोलन के प्रखर नेता

भारत की आजादी के आन्दोलन के प्रखर नेता लाला लाजपथ राय का नाम ही देशवासियों में स्फूर्ति तथा प्रेरणा का संचार कराता है। अपने देश धर्म तथा संस्कृति के लिए उनमें जो प्रबल प्रेम तथा आदर था उसी के कारण वे स्वयं को राष्ट्र के लिए समर्पित कर अपना जीवन दे सके। भारत को स्वाधीनता दिलाने में उनका त्याग, बलिदान तथा देशभक्ति अद्वितीय और अनुपम थी। उनके बहुविधि क्रियाकलाप में साहित्य-लेखन एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। वे ऊर्दू तथा अंग्रेजी के समर्थ रचनाकार थे। 


लालाजी का जन्म 28 जनवरी, 1865 को अपने ननिहाल के गाँव ढुंढिके (जिला  फरीदकोट, पंजाब) में हुआ था। उनके पिता लाला राधाकृष्ण लुधियाना जिले के जगराँव कस्बे के निवासी अग्रवाल वैश्य थे।  लाला राधाकृष्ण अध्यापक थे। वे ऊर्दू–फारसी के अच्छे जानकार थे तथा इस्लाम के मन्तव्यों में उनकी गहरी आस्था थी। वे मुसलमानी धार्मिक मन अनुष्ठानों का भी नियमित रूप से पालन करते थे। नमाज पढना और रमजान के महीने में रोजा रखना उनकी जीनवचर्या का अभिन्न अंग था यथापि वे बच्चे धर्म-जिज्ञासु थे। अपने पुत्र लाला लाजपतराय के आर्यसमाजी बन जाने पर उन्होंने वेद के दार्शनिक सिद्धान्त त्रेतवाद (ईश्वर, जीव तथा प्रकृति का अनादित्य) को समझने में भी रुचि दिखाई। लालाजी की इस जिज्ञासु प्रवृति उनके पुत्र पर भी पड़ा था। 



लाजपतराय की शिक्षा पाँचवें वर्ष में आरम्भ हुई। 1880 में उन्होंने कलकत्ता तथा पंजाब विश्वविद्यायल से एंट्रेंस की परीक्षा एक वर्ष में पास की और आगे पढ़ने के लिए लाहौर आये। यहाँ वे गर्वमेंट कालेज में प्रविष्ट हुए और 1982 में एफ० ए० की परीक्षा तथा मुख्यारी की परीक्षा साथ-साथ पास की। यहीं वे आर्यसमाज के सम्पर्क में आये और उसके सदस्य बन गये। डी०ए०वी० कालेज लाहौर के प्रथम प्राचार्य लाला हंसराज (आगे चलकर महात्मा) हंसराज के नाम से प्रसिद्ध) तथा प्रसिद्ध वैदिक विद्वान् पं गुरूदत्त सहपाठी थे, जिनके साथ उन्हें आगे चलकर आर्यसमाज का कार्य करना पड़ा। इनके द्वारा ही उन्हें महर्षि दयानन्द के विचारों का परिचय मिला। 



1882 के अंतिम दिनों में वे पहली बार आर्यसमाज लाहौर के वार्षिक उत्सव में सम्मिलित हुए। इस मार्मिक प्रसंग का वर्णन लालाजी ने अपनी आत्मकथा में इस प्रकार किया है-‘‘उस दिन स्वर्गीय लाला मदनसिंह बी० ए० (डी० ए० वी० कालेज के संस्थापकों में प्रमुख) का व्याख्यान था। उनको मुझसे बहुत प्रेम था। उन्होंने व्याख्यान देने से पहले समाज मंदिर की छत पर मुझे अपना लिखा व्याख्यान सुनाया और मेरी सम्मति पूछी।



 मैंने उस व्याख्यान को बहुत पसन्द किया। जब मैं छत से नीचे उतरा तो लाला साईंदासजी (आर्यसमाज लाहौर के प्रथम मंत्री) ने मुझे पकड़ लिया और अलग ले जाकर कहने लगे कि हमने बहुत समय तक इन्तजार किया है कि तुम हमारे साथ मिल जाओ। मैं उस घड़ी को भूल नहीं सकता। वह मेरे से बातें करते थे, मेरे मुँह की ओर देखते थे, तथा प्यार से पीठ पर हाथ फेरते थे। मैंने उनको जवाब दिया कि मैं तो उनके साथ हूँ। मेरा इतना कहना था कि उन्होंने फौरन समाज के सभासद बनने का प्रार्थना-पत्र मंगवाया और मेरे सामने रख दिया। मैं दो-चार मिनट तक सोचता रहा, परन्तु, उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारे हस्ताक्षर लिए बिना तुम्हें जाने न दूँगा। मैंने फौरन हस्ताक्षर कर दिए। उस समय उनके चेहरे पर प्रसन्नता की जो झलक थी उसका वर्णन मैं नहीं कर सकता। ऐसा मालूम होता था कि उनको हिन्दुस्तान की बादशाहत मिल गयी है। उन्होंने एकदम प० गुरूदत्त को बुलाया और सारा हाल सुनाकर मुझे उनके हवाले कर दिया। वह भी बहुत खुश हुए। लाला मदनसिंह के व्याख्यान की समाप्ति पर लाला साँईदास ने मुझे और प० गुरूदत्त को मंच पर खड़ा कर किया। हम दोनों से व्याखान दिलवाये। लोग बहुत खुश हुए और खूब तालियाँ बजाई। इन तालियों ने मेरे दिल पर जादू का-सा असर किया। मैं प्रसन्नता और सफलता की मस्ती में झूमता हुआ अपने घर लौटा।’’1 



यह है लालजी के आर्यसमाज में प्रवेश की कथा। लाला साँईदास आर्यसमाज के प्रति इतने अधिक समर्पित थे कि वे होनहार नवयुवकों को इस संस्था में प्रविष्ट करने के लिए सदा तत्पर रहते थे। स्वामी श्रद्धानन्द (तत्कालीन लाला मुंशीराम) को आर्यसमाज में लाने का श्रेय भी उन्हें ही है। 30 अक्टूबर, 1883 को जब अजमेर में ऋषि दयानन्द का देहान्त हो गया तो 9 नवम्बर, 1883 को लाहौर आर्यसमाज की ओर एक शोकसभा का आयोजन किया गया। इस सभा के अन्त में यह निश्चित हुआ कि स्वामी जी की स्मृति में एक ऐसे महाविद्यालय की स्थापना की जाये जिसमें वैदिक साहित्य, संस्कृति तथा हिन्दी की उच्च शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान में भी छात्रों को दक्षता प्राप्त कराई जाये। 1886 में जब इस शिक्षण की स्थापना हुई तो आर्यसमाज के अन्य नेताओं के साथ लाला लाजपतराय का भी इसके संचालन में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा तथा वे कालान्तर में डी०ए०वी० कालेज, लाहौर के महान स्तम्भ बने।

वकालत के क्षेत्र में

लाला लाजपतराय ने एक मुख्तार (छोटा वकील) के रूप में अपने मूल निवासस्थल जगराँव में ही वकालत आरम्भ कर दी थी; किन्तु यह कस्बा बहुत छोटा था, जहाँ उनके कार्य के बढ़ने की अधिक सम्भावना नहीं थी, अतः वे रोहतक चले गये। उन दिनों पंजाब प्रदेश में वर्तमान हरियाणा, हिमाचल तथा आज के पाकिस्तानी पंजाब का भी समावेश था। रोहतक में रहते हुए ही उन्होंने 1885 में वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की, 1886 में वे हिसार आ 
---------------------------------------------------------------------------
1 लाला लाजपतराय की आत्मकथा ग्रंथमाला, में प्रकाशित 1932 


गये। एक सफल वकील के रूप में 1892 तक वे यहीं रहे और इसी वर्ष लाहौर आये। तब से लाहौर ही उनकी सार्वजनिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया। लालाजी ने यों तो समाज-सेवा का कार्य हिसार में रहते हुए ही आरम्भ कर दिया था, जहाँ उन्होंने लाला चंदूलाल प० लखपतराय और लाला चूड़ामणि जैसे  आर्यसमाजी कार्यकर्ताओं के साथ सामाजिक हित की योजनाओं के कार्यान्वयन में योगदान किया किन्तु लाहौर आने पर वे आर्यसमाज के अतिरिक्त राजनैतिक आन्दोलन के साथ भी जुड़ गये। 1888 में वे प्रथम बार कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में सम्मिलित हुए जिनकी अध्यक्षता मि० जार्ज यूल ने की थी। 1906 में वे प० गोपालकृष्ण गोखले के साथ कांग्रेस के एक शिष्टमण्डल के सदस्य के रूप में इंग्लैड गये। यहाँ से वे अमेरिका चले गये। 



उन्होंने कई बार विदेश यात्राएँ की और वहाँ रहकर पश्चिमी देशों के समक्ष भारत की राजनैतिक परिस्थिति की वास्तविकता से वहां के लोगों को परिचित कराया तथा उन्हें स्वाधीनता आन्दोलन की जानकारी दी। 



लाला लाजपतराय ने अपने सहयोगियों-लोकमान्य तिलक तथा विपिनचन्द्र पाल के साथ मिलकर कांग्रेस में उग्र विचारों का प्रवेश कराया। 1885 में अपनी स्थापना से लेकर लगभग बीस वर्षो तक कांग्रेस ने एक राजभवन संस्था का चरित्र बनाये रखा था। इसके नेतागण वर्ष में एक बार बड़े दिन की छुट्टियों में देश के किसी नगर में एकत्रित होने और विनम्रता पूर्वक शासनों के सूत्रधारों (अंग्रेजी) से सरकारी उच्च सेवाओं में भारतीयों को अधिकाधिक संख्या में प्रविष्ट युगराज के भारत-आगमन पर उनका स्वागत करने का प्रस्ताव आया तो लालाजी ने उनका डटकर विरोध किया। कांग्रेस के मंच ये यह अपनी किस्म का पहला तेजस्वी भाषण हुआ जिसमें देश की अस्मिता प्रकट हुई थी। 



1907 में जब पंजाब के किसानों में अपने अधिकारों को लेकर चेतना उत्पन्न हुई तो सरकार का क्रोध लालाजी तथा सरदार अजीतसिंह (शहीद भगतसिंह के चाचा) पर उमड़ पड़ा और इन दोनों देशभक्त नेताओं को देश से निर्वासित कर उन्हें पड़ोसी देश बर्मा के मांडले नगर में नजरबंद कर दिया, किन्तु देशवासियों द्वारा सरकार के इस दमनपूर्ण कार्य का प्रबल विरोध किये जाने पर सरकार को अपना यह आदेश वापस लेना पड़ा। लालाजी पुनः स्वदेश आये और देशवासियों ने उनका भावभीना स्वागत किया। लालाजी के राजनैतिक जीवन की कहानी अत्यन्त रोमांचक तो है ही, भारतीयों को स्वदेश-हित के लिए बलिदान तथा महान् त्याग करने की प्रेरणा भी देती है।

जन-सेवा के कार्य

लालाजी केवल राजनैतिक नेता और कार्यकर्ता ही नहीं थे। उन्होंने जन सेवा का भी सच्चा पाठ पढ़ा था। जब 1896 तथा 1899 (इसे राजस्थान में छप्पन का अकाल कहते हैं, क्योंकि यह विक्रम का 1956 का वर्ष था) में उत्तर भारत में भयंकर दुष्काल पड़ा तो लालाजी ने अपने साथी लाला हंसराज के सहयोग से अकालपीड़ित लोगों को सहायता पहुँचाई। जिन अनाथ बच्चों को ईसाई पादरी अपनाने के लिए तैयार थे और अन्ततः जो उनका धर्म-परिवर्तन करने के इरादे रखते थे उन्हें इन मिशनरियों के चुंगुल से बचाकर फीरोजपुर तथा आगरा के आर्य अनाथलायों में भेजा। 1905 में कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में भयंकर भूकम्प आया। उस समय भी लालाजी सेवा-कार्य में जुट गये और डी०ए०वी० कालेज लाहौर के छात्रों के साथ भूकम्प-पीड़ितों को राहत प्रदान की। 1907-08 में उड़ीसा मध्यप्रदेश तथा संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) से भी भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा और लालाजी को पीडितों की सहायता के लिए आगे आना पड़ा।

पुनः राजनैतिक आन्दोलन में

1907 के सूरत के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में लाला लाजपतराय ने अपने सहयोगियों के द्वारा राजनीति में गरम दल की विचारधारा का सूत्रपात कर दिया था और जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गये थे कि केवल प्रस्ताव पास करने और गिड़गिड़ाने से स्वतंत्रता मिलने वाली नहीं है। हम यह देख चुके हैं कि जनभावना को देखते हुए अंग्रेजों को उनके देश-निर्वासन को रद्द करना पड़ा था। वे स्वदेश आये और पुनः स्वाधीनता के संघर्ष में जुट गये। प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) के दौरान वे एक प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य के रूप में पुनः इंग्लैंड गये और देश की आजादी के लिए प्रबल जनमत जागृत किया। वहाँ से वे जापान होते हुए अमेरिका चले गये और स्वाधीनता-प्रेमी अमेरिकावासियों के समक्ष भारत की स्वाधीनता का पथ प्रबलता से प्रस्तुत किया। 


यहाँ इण्डियन होम रूल लीग की स्थापना की तथा कुछ ग्रन्थ भी लिखे। 20 फरवरी, 1920 को जब वे स्वदेश लौटे तो अमृतसर में जलियावाला बाग काण्ड हो चुका था और सारा राष्ट्र असन्तोष तथा क्षोभ की ज्वाला में जल रहा था। इसी बीच महात्मा गांधी ने सहयोग आन्दोलन आरम्भ किया तो लालाजी पूर्ण तत्परता के साथ इस संघर्ष में जुट गये। 1920 में ही वे कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष बने। उन दिनों सरकारी शिक्षण संस्थानों के बहिस्कार विदेशी वस्त्रों के त्याग, अदालतों का बहिष्कार, शराब के विरुद्ध आन्दोलन, चरखा और खादी का प्रचार जैसे कार्यक्रमों को कांग्रेस ने अपने हाथ में ले रखा था, जिसके कारण जनता में एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हो चला था। इसी समय लालाजी को कारावास का दण्ड मिला, किन्तु खराब स्वास्थ्य के कारण वे जल्दी ही रिहा कर दिये गये। 



1924 में लालाजी कांग्रेस के अन्तर्गत ही बनी स्वराज्य पार्टी में शामिल हो गये और केन्द्रीय धारा सभा (सेंटल असेम्बली) के सदस्य चुन लिए गये। जब उनका पं० मोतीलाल नेहरू से कतिपय राजनैतिक प्रश्नों पर मतभेद हो गया तो उन्होंने नेशनलिस्ट पार्टी का गठन किया और पुनः असेम्बली में पहुँच गये। अन्य विचारशील नेताओं की भाँति लालाजी भी कांग्रेस में दिन-प्रतिदिन बढ़ने वाली मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से अप्रसन्नता अनुभव करते थे, इसलिए स्वामी श्रद्धानन्द तथा पं० मदनमोहन मालवीय के सहयोग से उन्होंने हिन्दू महासभा के कार्य को आगे बढ़ाया। 1925 में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष भी बनाया गया। ध्यातव्य है कि उन दिनों हिन्दू महासभा का कोई स्पष्ट राजनैतिक कार्यक्रम नहीं था और वह मुख्य रूप से हिन्दू संगठन, अछूतोद्धार, शुद्धि जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में ही दिलचस्पी लेती थी। इसी कारण कांग्रेस से उसे थोड़ा भी विरोध नहीं था। यद्यपि संकीर्ण दृष्टि से अनेक राजनैतिक कर्मी लालाजी के हिन्दू महासभा में रुचि लेने से नाराज भी हुए किन्तु उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की और वे अपने कर्तव्यपालन में ही लगे रहे।

जीवन संध्या

1928 में जब अंग्रेजों द्वारा नियुक्त साइमन भारत आया तो देश के नेताओं ने उसका बहिस्कार करने का निर्णय लिया। 30 अक्टूबर, 1928 को कमीशन लाहौर पहुँचा तो जनता के प्रबल प्रतिशोध को देखते हुए सरकार ने धारा 144 लगा दी। लालाजी के नेतृत्व में नगर के हजारों लोग कमीशन के सदस्यों को काले झण्डे दिखाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचे और ‘साइमन वापस जाओ’ के नारों से आकाश गुँजा दिया। इस पर पुलिस को लाठीचार्ज का आदेश मिला। उसी समय अंग्रेज सार्जेंट साण्डर्स ने लालाजी की छाती पर लाठी का प्रहार किया जिससे उन्हें सख्त चोट पहुँची। उसी सायं लाहौर की एक विशाल जनसभा में एकत्रित जनता को सम्बोधित करते हुए नरकेसरी लालाजी ने गर्जना करते हुए कहा-मेरे शरीर पर पडी़ लाठी की प्रत्येक चोट अंग्रेजी साम्राज्य के कफन की कील का काम करेगी। इस दारुण प्रहात से आहत लालाजी ने अठारह दिन तक विषम ज्वर पीड़ा भोगकर 17 नवम्बर 1928 को परलोक के लिए प्रस्थान किया।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

मैं खुदा हूँ - इस्लाम और वैदिक अद्वैतवाद (सूफीवाद के परिपेक्ष्य में)


सूफीवाद में समय-समय पर कुछ हिला देने वाले विचारक भी पैदा हुए! जिन्होंने इस्लाम में वैदिक अद्वैत को पुष्ट करने की कोशिश की !

सूफी परम्परा का आरम्भ हसन (६४२-७२८) जो की बसरा (ईराक) में हुए, उनके द्वारा हुआ! हसन उम्मया शासकों के खिलाफ थे और उनकी शान-शौकत भरी जीवन शैली से नफ़रत करते थे!
हसन के बाद एक मशहूर नाम अबू हाशिम (मृत्यु: ७७६) का है, जो कूफा (ईराक) में रहते थे!

बायजीद बिस्तामी (मृत्यु: ८७४) ने इस्लामिक नेताओं को, और पैगम्बर के नाम पर मौज करने वालों को खुली चुनौती दे दी ! उन्होंने तौहीद (Monotheism/एकेश्वरवाद) को एक क्रांतिकारी रूप दे दिया! उनके तौहीद के सिद्धांत में प्रेमी और प्रेमिका दोनों एक हो गए! उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि, इब्राहीम, मूसा, और मोहम्मद मैं हूँ और जो भी ईश्वर के प्रेम में डूब कर फना (मिट) हो गया वही ईश्वर है!! 
इस प्रकार बायजीद ने उपनिषदों के सार को इस्लाम के सम्मुख रखा, परन्तु डरे हुए और लोभी इस्लामिक नेताओं ने उनकी बातों को सिरे से नकार दिया! इस विषय पर कबीर का भी मत है कि यदि आप उस अलख(जो दीखता नहीं है) उसे देखना चाहते हो तो उसे संतों के रूप में देखों! क्योंकि वह अपने भक्तों के ह्रदय में बसता है !!

सबसे अधिक चौंका देने वाला, साहस की सीमायें तोडने वाला और इस्लामी क़ानून को चुनौती देने वाला एक प्रसिद्द नाम है - हुसैन बिन मनसूर अल-हल्लाज (AL-HALLAJ) का !!

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

खरबूजा - चाक़ू : चाक़ू - खरबूजा

खरबूजा - चाक़ू : चाक़ू - खरबूजा आज देश करवट ले रहा है , नई सोच का वक्त चल रहा है , चिंतन - मनन , विचार - विमर्श न जाने और भी क्या क्या हो रहा है !


 " क्या - क्या " से मतलब जानने से पहले यह समझना अत्यावश्यक है : इतिहास गवाह है - जब भी बड़े अत्याचार का खात्मा हुआ है , 'बड़े' ने अपने स्वयं के अंत से पहले 'मातहतों' का अंत कराया है . रावण , कंस , कौरव .... किसी भी वंश के इतिहास को पढ़ लें - लगभग एक सी कहानी नज़र आयेगी . पुनः लेख की पहली पंक्ति पर आता हूँ ....... वर्तमान भी ऊहापोह मचा रहा है . वर्तमान " वंश " के कई 'मातहत' भी हवाहवाई हो रहे हैं , हाँ मातहतों की फेहरिस्त बड़ी लम्बी है .( रावण के कुल जमा २ भाई और थे उन में से भी एक शरणागत हो गया , परन्तु दुर्योधन के ९९ भाई और थे ,इनमेंसे भी एक ही शरणागत हुआ था ) वर्तमान वंश या यूं कहें " कुनबा " बहुत बहुत बहुत ...... लम्बा है ..... समय तो लगेगा ही ! चिल - पौं भी कुछ ज्यादा भी होगी , होनी भी चाहिए - कुनबा जो बड़ा है ! हाँ , इनकी ताक झाँक से क्षणिक परेशानियां भी आयेगी , हंसी भी आयेगी , गुस्सा भी आयेगा , रोना ...... सब कुछ होगा . लेकिन याद रक्खें : रात अंधेरी बाद चांदनी आती है ; धूप निकलते देख नींद उड़ जाती है . ध्यान रक्खें : वर्तमान कुनबे में से कोई " शरणागत " न आ जाय !!! अभी कई " हिसार " पार करने हैं , कई हरियाणा - बिहार - आंध्र - महाराष्ट्र फतह करने हैं . देखिये फतह तो करने ही पड़ेंगे क्योंकि साफ़ नज़र आ रहा है कि वर्तमान कहीं भी सुधरता नहीं दिख रहा . जब बिगाड़ आता है तो सागर के हिलोरे की तरह सब तरफ एकमेक ही हो जाता है , अब इसमे मीडिया हो या आम जन - हिलोरे तो एक जैसे ही लगते हैं ! भ्रमित करना ही तो एकमात्र लक्ष्य है !! भ्रम जाल से निकालना भी " वर्तमान " का ही तो काम है !!!!!!


 हाँ , शीर्षक की बात : चाकू के अवतार में तो हमेशा हमेशा " जनता " ही अवतरित होगी और खरबूजा रूपी रावण का ही अंत होगा . वैसे कुनबे का सपरिवार जाना न केवल श्रेयकर है बल्कि भविष्य के लिए हितकर भी है . और ठीक उसी तरह जा भी रहा है .......



लिखने वाले का नाम :      जुगल किशोर सोमाणी , जयपुरईमेल :      jugalkishoresomani@yahoo.co.in
स्थान :      जयपुरसमय :     Thursday, October 20, 2011 2:2
http://www.bharatswabhimantrust.org/bharatswa/DailyBlog.aspx

रविवार, 11 सितंबर 2011

वेदों में विज्ञान - एंटीमैटर क्या है ?


       वेदों में गूढ़ विज्ञान-सम्बन्धी सामग्री विस्तृत मात्रा में संचित है। जिसमें से बहुत ही अल्प मात्रा में अबतक जानकारी हो सकी है,कारण यह है कि वैज्ञानिक सामग्री ऋचाओं में अलंकारिक भाषा में है जिसका शाब्दिक अर्थ या तो सामान्य सा दिखाई पड़ता है या वर्तमान सभ्यता के संदर्भ में प्रथम दृष्टितया कुछ तर्क संगत नहीं दिखलाई पड़ता जबकि उसी पर गहन विचार करनें के पश्चात उसका कुछ अंश जब समझ में आता है तो बहुत ही आश्चर्य होता है कि वेद की छोटी-छोटी ऋचाओं(सूत्रोंके रूप में कितने गूढ़ एवं कितने उच्च स्तर के वैज्ञानिक रहस्य छिपे हुए हैं।

       कुछ ही समय पूर्व साइन्स रिपोर्टर नामक अंग्रेजी पत्रिका जो नेशनल इंस्टीच्युट आफ साइन्स कम्युनिकेशन्स ऐन्ड इन्फार्मेशन रिसोर्सेज (NISCAIR)/CSIR,डा०के० यस० कृष्णन मार्ग नई दिल्ली ११००१२ द्वारा प्रकाशित हुई थी,में माह मई २००७ के अंक में एक लेख ANTIMATTER The ultimate fuel के नाम के शीर्षक से छपा था। इस लेख के लेखक श्री डी०पी०सिहं एवं सुखमनी कौर ने यह लिखा है कि सर्वाधिक कीमती वस्तु संसार में हीरायूरेनियमप्लैटिनमयहाँ तक कि कोई पदार्थ भी नहीं है बल्कि अपदार्थ/या प्रतिपदार्थ अर्थात ANTIMATTER है। 

वैज्ञानिकों ने लम्बे समय तक किये गये अनुसंधानों एवं सिद्धान्तो के आधार यह माना है कि ब्रह्मांड में पदार्थ के साथ-साथ अपदार्थ या प्रतिपदार्थ भी समान रूप से मौजूद है। इस सम्बन्ध में वेदों में ऋग्वेद के अन्तर्गत नासदीय सूक्त जो संसार में वैज्ञानिक चिंतन में उच्चतम श्रेणी का माना जाता की एक ऋचा में लिखा है किः-

तम आसीत्तमसा गू---हमग्रे----प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्।
तुच्छेच्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्।।
(ऋग्वेद १०।१२९।३)
अर्थात्
       सृष्टि से पूर्व प्रलयकाल में सम्पूर्ण विश्व मायावी अज्ञान(अन्धकारसे ग्रस्त थासभी अव्यक्त और सर्वत्र एक ही प्रवाह थावह चारो ओर से सत्-असत्(MATTER AND ANTIMATTER) से आच्छादित था। वही एक अविनाशी तत्व तपश्चर्या के प्रभाव से उत्पन्न हुआ। वेद की उक्त ऋचा से यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मांड के प्रारम्भ में सत् के साथ-साथ असत् भी मौजूद था (सत् का अर्थ है पदार्थ

 यह कितने आश्चर्य का विषय है कि वर्तमान युग में वैज्ञानिकों द्वारा अनुसंधान पर अनुसंधान करने के पश्चात कई वर्षों में यह अनुमान लगाया गया कि विश्व में पदार्थ एवं अपदार्थ/प्रतिपदार्थ(Matter and Antimatter) समान रूप से उपलब्ध है। जबकि ऋग्वेद में एक छोटी सी ऋचा में यह वैज्ञानिक सूत्र पहले से ही अंकित है। उक्त लेख में यह भी कहा गया है कि Matter and Antimatter जब पूर्ण रूप से मिल जाते हैं तो पूर्ण उर्जा में बदल जाते है। वेदों में भी यही कहा गया है कि सत् और असत् का विलय होने के पश्चात केवल परमात्मा की सत्ता या चेतना बचती है जिससे कालान्तर में पुनः सृष्टि (ब्रह्मांड) का निर्माण होता है।

       छान्दोग्योपनषद् में भी ब्रह्म एवं सृष्टि के बारे में यह उल्लेख आता है कि आदित्य (केवल वर्तमान अर्थ सूर्य नहीं,बल्कि व्यापक अर्थ मेंब्रह्म है। उसी की व्याख्या की जाती है। तत्सदासीत्-वह असत् शब्द से कहा जाने वाला तत्वउत्पत्ति से पूर्व स्तब्धस्पन्दनरहितऔर असत् के समान थासत् यानि कार्याभिमुख होकर कुछ प्रवृति पैदा होने से सत् हो गया। फिर उसमें भी कुछ स्पन्दन प्राप्तकर वह अकुरित हुआ। वह एक अण्डे में परणित होगया। वह कुछ समय पर्यन्त फूटावह अण्डे के दोनों खण्ड रजत एवं सुवर्णरूप हो गये। फिर उससे जो उत्पन्न हुआ वह यह आदित्य है। उससे उत्पन्न होते ही बड़े जोरों का शब्द हुआ तथा उसी से सम्पूर्ण प्राणी और सारे भोग पैदा हुए हैं। इसीसे उसका उदय और अस्त होने पर दीर्घशब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं तथा सम्पूर्ण प्राणी और सारे भोग भी उत्पन्न होते हैं।
 अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्ततं जायमानं घोषा 
उलूलवोऽनुदतिष्ठन्त्सर्वाणि च भूतानि सर्वे च 
कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्या यनं प्रति घोषा
 उलूलवोऽनुत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः।
(छान्दग्योपनिषद् -शाङ्करभाष्यार्थ खण्ड १९ ।।३।।

(अधुनिक वैज्ञानिक भी ब्रह्माण्ड के पैदा होने पर जोर की ध्वनि होना ही मानते है। स्टीफेन हाँकिंग महाविज्ञानी आंइस्टाइन के आपेक्षिकता सिद्धान्त की व्याख्या करते हुये घोषित करते है कि दिक् और काल (Time and spaceका आरम्भ महाविस्फोट (Big bang) से हुआ और इसकी परणति ब्लैक होल से होगी।
_________________________________________________________________

एंटीमैटर क्या है ?


कणीय भौतिकी में, एंटीमैटर पदार्थ के एंटीपार्टिकल के सिद्धांत का विस्तार होता है, जहां एंटीमैटर उसी प्रकार एंटीपार्टिकलों से बना होता है, जिस प्रकार पदार्थ कणों का बना होता है। उदाहरण के लिये, एक एंटीइलेक्ट्रॉन (एक पॉज़ीट्रॉन, जो एक घनात्मक आवेश सहित एक इलेक्ट्रॉन होता है) एवं एक एंटीप्रोटोन (ऋणात्मक आवेश सहित एक प्रोटोन) मिल कर एक एंटीहाईड्रोजन परमाणु ठीक उसी प्रकार बना सकते हैं, जिस प्रकार एक इलेक्ट्रॉन एवं एक प्रोटोन मिल कर हाईड्रोजन परमाणु बनाते हैं। साथ ही पदार्थ एवं एंटीमैटर के संगम का परिणाम दोनों का विनाश (एनिहिलेशन) होता है, ठीक वैसे ही जैसे एंटीपार्टिकल एवं कण का संगम होता है। जिसके परिणामस्वरूप उच्च-ऊर्जा फोटोन (गामा किरण) या अन्य पार्टिकल-एंटीपार्टिकल युगल बनते हैं। वैसे विज्ञान कथाओं और साइंस फिक्शन चलचित्रों में कई बार एंटीमैटर का नाम सुना जाता रहा है।


एंटीमैटर केवल एक काल्पनिक तत्व नहीं, बल्कि असली तत्व होता है। इसकी खोज बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में हुई थी। तब से यह आज तक वैज्ञानिकों के लिए कौतुहल का विषय बना हुआ है। जिस तरह सभी भौतिक वस्तुएं मैटर यानी पदार्थ से बनती हैं और स्वयं मैटर में प्रोटोन, इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन होते हैं, उसी तरह एंटीमैटर में एंटीप्रोटोन, पोसिट्रॉन्स और एंटीन्यूट्रॉन होते हैं।

 एंटीमैटर इन सभी सूक्ष्म तत्वों को दिया गया एक नाम है। सभी पार्टिकल और एंटीपार्टिकल्स का आकार एक समान किन्तु आवेश भिन्न होते हैं, जैसे कि एक इलैक्ट्रॉन ऋणावेशी होता है जबकि पॉजिट्रॉन घनावेशी चार्ज होता है। जब मैटर और एंटीमैटर एक दूसरे के संपर्क में आते हैं तो दोनों नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मांड की उत्पत्ति का सिद्धांत महाविस्फोट (बिग बैंग) ऐसी ही टकराहट का परिणाम था। हालांकि, आज आसपास के ब्रह्मांड में ये नहीं मिलते हैं लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड के आरंभ के लिए उत्तरदायी बिग बैंग के एकदम बाद हर जगह मैटर और एंटीमैटर बिखरा हुआ था। विरोधी कण आपस में टकराए और भारी मात्रा में ऊर्जा गामा किरणों के रूप में निकली। इस टक्कर में अधिकांश पदार्थ नष्ट हो गया और बहुत थोड़ी मात्रा में मैटर ही बचा है निकटवर्ती ब्रह्मांड में। इस क्षेत्र में ५० करोड़ प्रकाश वर्ष दूर तक स्थित तारे और आकाशगंगा शामिल हैं। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार सुदूर ब्रह्मांड में एंटीमैटर मिलने की संभावना है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर के खगोलशास्त्रियों के एक समूह ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के गामा-रे वेधशाला से मिले चार साल के आंकड़ों के अध्ययन के बाद बताया है कि आकाश गंगा के मध्य में दिखने वाले बादल असल में गामा किरणें हैं, जो एंटीमैटर के पोजिट्रान और इलेक्ट्रान से टकराने पर निकलती हैं। पोजिट्रान और इलेक्ट्रान के बीच टक्कर से लगभग ५११ हजार इलेक्ट्रान वोल्ट ऊर्जा उत्सर्जित होती है।इन रहस्यमयी बादलों की आकृति आकाशगंगा के केंद्र से परे, पूरी तरह गोल नहीं है। इसके गोलाई वाले मध्य क्षेत्र का दूसरा सिरा अनियमित आकृति के साथ करीब दोगुना विस्तार लिए हुए है।



एंटीमैटर की खोज में रत वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्लैक होल द्वारा तारों को दो हिस्सों में चीरने की घटना में एंटीमैटर अवश्य उत्पन्न होता होगा। इसके अलावा वे लार्ज हैडरन कोलाइडर जैसे उच्च-ऊर्जा कण-त्वरकों द्वारा एंटी पार्टिकल उत्पन्न करने का प्रयास भी कर रहे हैं।


पृथ्वी पर एंटीमैटर की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन वैज्ञानिकों ने प्रयोगशालाओं में बहुत थोड़ी मात्रा में एंटीमैटर का निर्माण किया है। प्राकृतिक रूप में एंटीमैटर पृथ्वी पर अंतरिक्ष तरंगों के पृथ्वी के वातावरण में आ जाने पर अस्तित्व में आता है या फिर रेडियोधर्मी पदार्थ के ब्रेकडाउन से अस्तित्व में आता है। शीघ्र नष्ट हो जाने के कारण यह पृथ्वी पर अस्तित्व में नहीं आता, लेकिन बाह्य अंतरिक्ष में यह बड़ी मात्र में उपलब्ध है जिसे अत्याधुनिक यंत्रों की सहायता से देखा जा सकता है।

 एंटीमैटर नवीकृत ईंधन के रूप में बहुत उपयोगी होता है। लेकिन इसे बनाने की प्रक्रिया फिल्हाल इसके ईंधन के तौर पर अंतत: होने वाले प्रयोग से कहीं अधिक महंगी पड़ती है। इसके अलावा आयुर्विज्ञान में भी यह कैंसर का पेट स्कैन (पोजिस्ट्रान एमिशन टोमोग्राफी) के द्वारा पता लगाने में भी इसका प्रयोग होता है। साथ ही कई रेडिएशन तकनीकों में भी इसका प्रयोग प्रयोग होता है।
______________________________________________________________________________________________

इस विषय पर विभिन्न समाचार पत्रों (News Papers) में प्रकाशित लेखों के लिंक अंग्रेजी वर्णों (English Words) में नीले रंग (blue color) से दिए गए हैं !!!

____________________
साभार : पूर्वांश भाग "वेद-विद्या"  वेबसाइट से लिया गया है, जो कि वहाँ  मन्त्रों का वैज्ञानिक महत्त्व नामक लेख में उपलब्ध है.

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

गौहिंसा का विरोध आन्दोलन - (भारत स्वाभिमान)



भारत देश के करूणावान सज्जनों,
क्या आप कटती हुई गायों को बचाना चाहते हैं ..............?
निरीह गौधन पशुधन के साथ हिंसा का ताण्डव!!


द्रवित हो उठने वाले भारतवासियों,

उत्तर प्रदेश के बिजनेसमेन (कसाई-व्यापारीगण) अब गायों को काटने के लिए, आधुनिक स्वचालित  यांत्रिक कत्लखाने,  बहुत जल्द ही बनाने जा रहे है ताकि गायों को तीव्र गति से काटा जा सके, उनके मांस को विदेशों में निर्यात कर भारी लाभ कमाया जा सके | अगर ये लोग ऐसे क्रूर गोहिंसाग्रह स्थापित करने में कामयाब हो जाते है तो फिर पूरे भारत में इन कत्लखानो की बाढ़ ही आ जाएगी | सम्पूर्ण भारतवर्ष के लोग इन कत्लखानो को खोलने का पुरजोर विरोध कर रहे है और उत्तर प्रदेश की सरकार ने कहा है कि अगर एक करोड़ लोग भी कत्लखाने खोलने का विरोध  करते है तो  इन यांत्रिक स्वचालित पशुवधग्रह को खोलने की इजाजत  नहीं दी जाएगी| तो आईए इस निर्दयी कत्लखानों का तीव्र विरोध करें और इस आन्दोलन की हिमायत करें।

हम अहिंसा प्रधान इस देश के करूणावान नागरिक है।हम गायों की पूजा करते है | भारतीय होने के नाते और मानवता के नाते हम ऐसा होते हुए, हरगिज नहीं देख सकते ................ कृपया इस आन्दोलन को आप अपना समर्थन अवश्य दें |

अगर आपको लगता है कि इस तरह के कत्लखाने नहीं खुलने चाहिए तो कृपया  05223095743 पर एक मिस कोल जरूर करें| एक घंटी बजने के बाद कोल अपने आप डिस-कनेक्ट हो जाएगी |

जिस तरह से आपने अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल के आन्दोलन को सफल बनाया उसी तरह से आप मिस कॉल कर के इस कत्लखानों के विरोध आन्दोलन को अपना समर्थन दें |
इसमें आपका कोई खर्चा नहीं है, बल्कि आपके इस एक मिस कोल से प्रतिदिन कटने वाली हजारों लाखों गायें बच जाएगी |

कृपया आप अपने मोबाइल से मिस्कोल जरूर करें और इसे जितने लोगों तक पंहुचा सके पहुचाये |

मैने मिस कोल कर दिया है ............ अब आपकी बारी है ..................
अभी मिस कोल करे - नंबर है - 05223095743

बुधवार, 7 सितंबर 2011

परमाणु ऊर्जा - ना बाबा ना ! (Nuclear Energy an Ultimate Poision)




मंगलवार, 6 सितंबर 2011

सत्ता के हस्तांतरण की संधि - Transfer of Power Agreement (India - भारत) --- भाई राजीव दीक्षित


आप सोच रहे होंगे कि 'सत्ता के हस्तांतरण की संधि' ये क्या है ? आज पढ़िए सत्ता के हस्तांतरण की संधि ( Transfer of Power Agreement ) अर्थात भारत की स्वतंत्रता की संधि. ये इतनी भयावह संधि है कि यदि आप अंग्रेजों द्वारा सन 1615 से लेकर 1857 तक किये गए सभी 565 संधियों अथवा कहें कि षडयंत्र को जोड़ देंगे तो उस से भी अधिक भीषण और भयावह संधि है ये. 14 अगस्त 1947 की रात्रि को जो कुछ हुआ था वो वास्तव में स्वतंत्रता नहीं आई थी अपितु ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट हुआ था पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में.Transfer of Power और Independence ये दो अलग विषय हैं.स्वतंत्रता और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग विषय हैं एवं सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है ? आप देखते होंगे क़ि एक पार्टी की सरकार है, वो चुनाव में पराजित जाये, दूसरी पार्टी की सरकार आती है तो दूसरी पार्टी का प्रधानमन्त्री जब शपथ ग्रहण करता है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत पश्चात एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है, आप लोगों में से बहुतों ने देखा होगा, तो जिस रजिस्टर पर आने वाला प्रधानमन्त्री हस्ताक्षर करता है, उसी रजिस्टर को 'ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर' की बुक कहते हैं तथा उस पर हस्ताक्षर के पश्चात पुराना प्रधानमन्त्री नए प्रधानमन्त्री को सत्ता सौंप देता है एवं पुराना प्रधानमंत्री निकल कर बाहर चला जाता है.यही नाटक हुआ था 14 अगस्त 1947 की रात्रि को 12 बजे.लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में सौंपी थी, और हमने कह दिया कि स्वराज्य आ गया | कैसा स्वराज्य और काहे का स्वराज्य ? अंग्रेजो के लिए स्वराज्य का अर्थ क्या था ? और हमारे लिए स्वराज्य का आशय क्या था ? ये भी समझ लीजिये | अंग्रेज कहते थे क़ि हमने स्वराज्य दिया, अर्थात अंग्रेजों ने अपना राज आपको सौंपा है जिससे कि आप लोग कुछ दिन इसे चला लो जब आवश्यकता पड़ेगी तो हम पुनः आ जायेंगे | ये अंग्रेजो की व्याख्या (interpretation) थी एवं भारतीय लोगों की व्याख्या क्या थी कि हमने स्वराज्य ले लिया तथा इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए एवं भारत और पाकिस्तान नामक दो Dominion States बनाये गए हैं | ये Dominion State का अर्थ हिंदी में होता है एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य, ये शाब्दिक अर्थ है और भारत के सन्दर्भ में इसका वास्तविक अर्थ भी यही है. अंग्रेजी में इसका एक अर्थ है "One of the self-governing nations in the British Commonwealth" तथा दूसरा "Dominance or power through legal authority "| Dominion State और Independent Nation में जमीन आसमान का अंतर होता है | मतलब सीधा है क़ि हम (भारत और पाकिस्तान) आज भी अंग्रेजों के अधीन ही हैं. दुःख तो ये होता है कि उस समय के सत्ता के लालची लोगों ने बिना सोचे समझे अथवा आप कह सकते हैं क़ि पूरी मानसिक जागृत अवस्था में इस संधि को मान लिया अथवा कहें सब कुछ समझ कर ये सब स्वीकार कर लिया एवं ये जो तथाकथित स्वतंत्रता प्राप्त हुई इसका कानून अंग्रेजों के संसद में बनाया गया और इसका नाम रखा गया Indian Independence Act अर्थात भारत के स्वतंत्रता का कानून तथा ऐसे कपट पूर्ण और धूर्तता से यदि इस देश को स्वतंत्रता मिली हो तो वो स्वतंत्रता, स्वतंत्रता है कहाँ ? और इसीलिए गाँधी जी (महात्मा गाँधी) 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में नहीं आये थे. वो नोआखाली में थे और कोंग्रेस के बड़े नेता गाँधी जी को बुलाने के लिए गए थेकि बापू चलिए आप.गाँधी जी ने मना कर दिया था. क्यों ? गाँधी जी कहते थे कि मै मानता नहीं कि कोई स्वतंत्रता मिल रही है एवं गाँधी जी ने स्पष्ट कह दिया था कि ये स्वतंत्रता नहीं आ रही है सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हो रहा है और गाँधी जी ने नोआखाली से प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी | उस प्रेस स्टेटमेंट के पहले ही वाक्य में गाँधी जी ने ये कहाकि मैं भारत के उन करोड़ों लोगों को ये सन्देश देना चाहता हूँ कि ये जो तथाकथित स्वतंत्रता (So Called Freedom) आ रही है ये मै नहीं लाया | ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है | मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है | और 14 अगस्त 1947 की रात को गाँधी जी दिल्ली में नहीं थे नोआखाली में थे | माने भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था | क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे | (नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था वास्तव में बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही थी) और 14 अगस्त 1947 की रात्रि को जो कुछ हुआ है वो स्वतंत्रता नहीं आई .... ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में. अब शर्तों की बात करता हूँ , सब का उल्लेख करना तो संभव नहीं है परन्तु कुछ महत्वपूर्ण शर्तों की उल्लेख अवश्य करूंगा जिसे एक आम भारतीय जानता है और उनसे परिचित है ...............

०१) इस संधि की शर्तों के अनुसार हम आज भी अंग्रेजों के अधीन ही हैं. वो एक शब्द आप सब सुनते हैं न Commonwealth nations अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में Commonwealth Games हुए थे आप सब को याद होगा ही और उसी में बहुत बड़ा घोटाला भी हुआ है | ये Commonwealth का अर्थ होता है 'समान संपत्ति'. किसकी समान सम्पति ? ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति. आप जानते हैं ब्रिटेन की महारानी हमारे भारत की भी महारानी है और वो आज भी भारत की नागरिक है और हमारे जैसे 71 देशों की महारानी है वो. Commonwealth में 71 देश हैं और इन सभी 71 देशों में जाने के लिए ब्रिटेन की महारानी को वीजा की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि वो अपने ही देश में जा रही है परन्तु भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ब्रिटेन में जाने के लिए वीजा की आवश्यकता होती है क्योंकि वो दूसरे देश में जा रहे हैं अर्थात इसका अर्थ निकालें तो ये हुआ कि या तो ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक है अथवा फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है इसलिए ब्रिटेन की रानी को पासपोर्ट और वीजा की आवश्यकता नहीं होती है यदि दोनों बाते सही हैं तो 15 अगस्त 1947 को हमारी स्वतंत्रता की बात कही जाती है वो मिथ्या है एवं Commonwealth Nations में हमारी एंट्री जो है वो एक Dominion State के रूप में है ना क़ि Independent Nation के रूप में. इस देश में प्रोटोकोल है क़ि जब भी नए राष्ट्रपति बनेंगे तो 21 तोपों की सलामी दी जाएगी उसके अतिरिक्त किसी को भी नहीं. परन्तु ब्रिटेन की महारानी आती है तो उनको भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या अर्थ है? और पिछली बार ब्रिटेन की महारानी यहाँ आयी थी तो एक निमंत्रण पत्र छपा था और उस निमंत्रण पत्र में ऊपर जो नाम था वो ब्रिटेन की महारानी का था और उसके नीचे भारत के राष्ट्रपति का नाम था अर्थात हमारे देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक नहीं है. ये है राजनितिक दासता, हम कैसे मानें क़ि हम एक स्वतंत्र देश में रह रहे हैं. एक शब्द आप सुनते होंगे High Commission ये अंग्रेजों का एक दास देश दुसरे दास देश के यहाँ खोलता है परन्तु इसे Embassy नहीं कहा जाता. एक मानसिक दासता का उदाहरण भी देखिये ....... हमारे यहाँ के समाचार पत्रों में आप देखते होंगे क़ि कैसे शब्द प्रयोग होते हैं - (ब्रिटेन की महारानी नहीं) महारानी एलिज़ाबेथ, (ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स नहीं) प्रिन्स चार्ल्स , (ब्रिटेन की प्रिंसेस नहीं) प्रिंसेस डायना (अब तो वो हैं नहीं), अब तो एक और प्रिन्स विलियम भी आ गए है | 

०२) भारत का नाम INDIA रहेगा और पूरे संसार में भारत का नाम इंडिया प्रचारित किया जायेगा तथा सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा. हमारे व आपके लिए ये भारत है परन्तु दस्तावेजों में ये इंडिया है | संविधान के प्रस्तावना में ये लिखा गया है "India that is Bharat " जब क़ि होना ये चाहिए था "Bharat that was India " परन्तु दुर्भाग्य इस महान देश का क़ि ये भारत के स्थान पर इंडिया हो गया. ये इसी संधि के शर्तों में से एक है. अब हम भारत के लोग जो इंडिया कहते हैं वो कहीं से भी भारत नहीं है. कुछ दिन पहले मैं एक लेख पढ़ रहा था अब किसका था याद नहीं आ रहा है उसमे उस व्यक्ति ने बताया था कि इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा तथा ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा अब उस व्यक्ति की बात में कितनी सत्यता है मैं नहीं जानता, परन्तु भारत जब तक भारत था तब तक तो संसार में सबसे आगे था और ये जब से इंडिया हुआ है तब से पीछे, पीछे और पीछे ही होता जा रहा है | 

०३) भारत की संसद में वन्दे मातरम नहीं गाया जायेगा अगले 50 वर्षों तक अर्थात 1997 तक. 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस समस्या को उठाया तब जाकर पहली बार इस तथाकथित स्वतंत्र देश की संसद में वन्देमातरम गाया गया | 50 वर्षों तक नहीं गाया गया क्योंकि ये भी इसी संधि की शर्तों में से एक है और वन्देमातरम को लेकर मुसलमानों में जो भ्रम फैलाया गया वो अंग्रेजों के दिशानिर्देश पर ही हुआ था. इस गीत में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जो मुसलमानों के मन को ठेस पहुचाये. 

०४) इस संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस को जीवित अथवा मृत अंग्रेजों के हवाले करना था. यही कारण रहा क़ि सुभाष चन्द्र बोस अपने देश के लिए लापता रहे और कहाँ मर खप गए ये आज तक किसी को ज्ञात नहीं है. समय समय पर कई अफवाहें फैली परन्तु सुभाष चन्द्र बोस का पता नहीं लगा और ना ही किसी ने उनको ढूँढने में रूचि दिखाई. अर्थात भारत का एक महान स्वतंत्रता सेनानी (जो वास्तव में भारत के 'राष्ट्रपिता' थे, गाँधी जी तो 'प्लांट' किये हुए राष्ट्रपिता थे, ये भी देश का दुर्भाग्य ही था) अपने ही देश के लिए बेगाने हो गए. सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज बनाई थी ये तो आप सब लोगों को ज्ञात होगा ही परन्तु महत्वपूर्ण बात ये है क़ि ये 1942 में आज़ाद हिंद फ़ौज बनाई गयी थी और उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और सुभाष चन्द्र बोस ने इस काम में जर्मन और जापानी लोगों से सहायता ली थी जो कि अंग्रेजों के शत्रु थे और इस आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को सबसे अधिक हानि पहुंचाई थी और जर्मनी के हिटलर और इंग्लैंड के एटली और चर्चिल के व्यक्तिगत विवादों के कारण से ये द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ था और दोनों देश एक दूसरे के कट्टर शत्रु थे. एक शत्रु देश की सहायता से सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजों के नाकों चने चबवा दिए थे | एक तो अंग्रेज उधर विश्वयुद्ध में लगे थे दूसरी ओर उन्हें भारत में भी सुभाष चन्द्र बोस के कारण से कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा था | इसलिए वे सुभाष चन्द्र बोस के शत्रु थे |

०५) इस संधि की शर्तों के अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे लोग आतंकवादी थे और यही हमारे syllabus में पढाया जाता था बहुत दिनों तक तथा अभी कुछ समय पहले तक ICSE बोर्ड के किताबों में भगत सिंह को आतंकवादी ही बताया जा रहा था, वो तो भला हो कुछ लोगों का जिन्होंने नयायालय में एक केस किया और अदालत ने इसे हटाने का आदेश दिया है (ये समाचार मैंने इन्टरनेट पर ही अभी कुछ दिन पहले देखा था) | 

०६) आप भारत के सभी बड़े रेलवे स्टेशन पर एक पुस्तक की दुकान देखते होंगे "व्हीलर बुक स्टोर" वो इसी संधि के नियमों के अनुसार है. ये व्हीलर कौन था ? ये व्हीलर सबसे बड़ा अत्याचारी था. इसने इस देश की हजारों माँ, बहन और बेटियों के साथ बलात्कार किया था. इसने किसानों पर सबसे अधिक गोलियां चलवाई थी. 1857 की क्रांति के पश्चात कानपुर के निकट बिठुर में व्हीलर व नील नामक दो अंग्रजों ने यहाँ के सभी 24 हजार लोगों को हत्या करवा दी थी चाहे वो गोदी का बच्चा हो अथवा मरणासन्न स्थिति में पड़ा कोई वृद्ध. इस व्हीलर के नाम से इंग्लैंड में एक एजेंसी प्रारंभ हुई थी तथा वही भारत में आ गयी. भारत स्वतंत्र हुआ तो ये समाप्त होना चाहिए था, नहीं तो कम से कम नाम में ही परिवर्तन कर देते. परन्तु वो परिवर्तित नहीं किया गया क्योंकि ये इस संधि में है |

०७) इस संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेंगे परन्तु इस देश में कोई भी नियम चाहे वो किसी क्षेत्र में हो परिवर्तित नहीं जायेगा | इसलिए आज भी इस देश में 34735 नियम वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलता था | Indian Police Act, Indian Civil Services Act (अब इसका नाम है Indian Civil Administrative Act), Indian Penal Code (Ireland में भी IPC चलता है और Ireland में जहाँ "I" का अर्थ Irish है वहीँ भारत के IPC में "I" का अर्थ Indian है शेष सब के सब कंटेंट एक ही है, कोमा और फुल स्टॉप का भी अंतर नहीं है) Indian Citizenship Act, Indian Advocates Act, Indian Education Act, Land Acquisition Act, Criminal Procedure Act, Indian Evidence Act, Indian Income Tax Act, Indian Forest Act, Indian Agricultural Price Commission Act सब के सब आज भी वैसे ही चल रहे हैं बिना फुल स्टॉप और कोमा बदले हुए |

०८) इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे. नगर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे. आज देश का संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, राष्ट्रपति भवन कितने नाम गिनाऊँ सब के सब वैसे ही खड़े हैं और हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं. लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी नगर है , वास्को डी गामा नामक शहर है (वैसे वो पुर्तगाली था ) रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, (पटना में) फ्रेजर रोड, बेली रोड, ऐसे हजारों भवन और रोड हैं, सब के सब वैसे के वैसे ही हैं. आप भी अपने नगर में देखिएगा वहां भी कोई न कोई भवन, सड़क उन लोगों के नाम से होंगे | हमारे गुजरात में एक नगर है सूरत, इस सूरत में एक बिल्डिंग है उसका नाम है कूपर विला. अंग्रेजों को जब जहाँगीर ने व्यापार का लाइसेंस दिया था तो सबसे पहले वो सूरत में आये थे और सूरत में उन्होंने इस बिल्डिंग का निर्माण किया था | ये दासता का पहला अध्याय आज तक सूरत शहर में खड़ा है |

०९) हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों की है क्योंकि ये इस संधि में लिखा है और हास्यप्रद ये है क़ि अंग्रेजों ने हमारे यहाँ एक शिक्षा व्यवस्था दी और अपने यहाँ अलग प्रकार की शिक्षा व्यवस्था रखी है | हमारे यहाँ शिक्षा में डिग्री का महत्व है और उनके यहाँ ठीक विपरीत है. मेरे पास ज्ञान है और मैं कोई अविष्कार करता हूँ तो भारत में पूछा जायेगा क़ि तुम्हारे पास कौन सी डिग्री है ? यदि नहीं है तो मेरे अविष्कार और ज्ञान का कोई महत्व नहीं है. इसके विपरीत उनके यहाँ ऐसा कदापि नहीं है आप यदि कोई अविष्कार करते हैं और आपके पास ज्ञान है परन्तु कोई डिग्री नहीं हैं तो कोई बात नहीं आपको प्रोत्साहित किया जायेगा. नोबेल पुरस्कार पाने के लिए आपको डिग्री की आवश्यकता नहीं होती है. हमारे शिक्षा तंत्र को अंग्रेजों ने डिग्री में बांध दिया था जो आज भी वैसे के वैसा ही चल रहा है. ये जो 30 नंबर का पास मार्क्स आप देखते हैं वो उसी शिक्षा व्यवस्था की देन है, अर्थात आप भले ही 70 नंबर में फेल है परन्तु 30 नंबर लाये है तो पास हैं, ऐसे शिक्षा तंत्र से क्या उत्पन्न हो रहे हैं वो सब आपके सामने ही है और यही अंग्रेज चाहते थे. आप देखते होंगे क़ि हमारे देश में एक विषय चलता है जिसका नाम है अन्थ्रोपोलोग्य.| जानते है इसमें क्या पढाया जाता है ? इसमें दास लोगों क़ि मानसिक अवस्था के बारे में पढाया जाता है और ये अंग्रेजों ने ही इस देश में प्रारंभ किया था और आज स्वतंत्रता के 64 वर्षों के पश्चात भी ये इस देश के विश्वविद्यालयों में पढाया जाता है और यहाँ तक क़ि सिविल सर्विस की परीक्षा में भी ये चलता है | 

१०) इस संधि की शर्तों के अनुसार हमारे देश में आयुर्वेद को कोई सहयोग नहीं दिया जायेगा अर्थात हमारे देश की विद्या हमारे ही देश में समाप्त हो जाये ये षडंत्र किया गया. आयुर्वेद को अंग्रेजों ने नष्ट करने का भरसक प्रयास किया था परन्तु ऐसा कर नहीं पाए. संसार में जितने भी पैथी हैं उनमे ये होता है क़ि पहले आप रोगग्रस्त हों तो आपका इलाज होगा परन्तु आयुर्वेद एक ऐसी विद्या है जिसमे कहा जाता है क़ि आप रोगग्रस्त ही मत पड़िए | आपको मैं एक सच्ची घटना बताता हूँ, जोर्ज वाशिंगटन जो क़ि अमेरिका का पहला राष्ट्रपति था वो दिसम्बर 1799 में रोग शैय्या पर पड़ा और जब उसका बुखार ठीक नहीं हो रहा था तो उसके डाक्टरों ने कहा क़ि इनके शरीर का रक्त दूषित हो गया है जब इसको निकाला जायेगा तो ये बुखार ठीक होगा और उसके दोनों हाथों क़ि नसें डाक्टरों ने काट दी और रक्त निकल जाने के कारण से जोर्ज वाशिंगटन का देहांत हो गया. ये घटना 1799 की है और 1780 में एक अंग्रेज भारत आया था और यहाँ से प्लास्टिक सर्जरी सीख कर गया था अर्थात कहने आशय ये है क़ि हमारे देश का चिकित्सा विज्ञान कितना विकसित था उस समय और ये सब आयुर्वेद के कारण से था और उसी आयुर्वेद को आज हमारी सरकार ने हाशिये पर पंहुचा दिया है | 

११) इस संधि के अनुसार हमारे देश में गुरुकुल संस्कृति को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा. हमारे देश के समृद्धि और यहाँ उपस्थित उच्च तकनीक के कारण ये गुरुकुल ही थे और अंग्रेजों ने सबसे पहले इस देश की गुरुकुल परंपरा को ही तोडा था, मैं यहाँ लार्ड मेकॉले की एक उक्ति को यहाँ बताना चाहूँगा जो उसने 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में दिया था, उसने कहा था "“I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation”. गुरुकुल का अर्थ हम लोग केवल वेद, पुराण,उपनिषद ही समझते हैं जो कि हमारी मूर्खता है यदि आज की भाषा में कहूं तो ये गुरुकुल जो होते थे वो सब के सब Higher Learning Institute हुआ करते थे.

१२) इस संधि में एक और विशेष बात है, इसमें कहा गया है क़ि यदि हमारे देश के (भारत के) न्यायालय में कोई ऐसा केस आ जाये जिसके निर्णय के लिए कोई कानून न हो इस देश में या उसके निर्णय को लेकर संविधान में भी कोई जानकारी न हो तो साफ़ साफ़ संधि में लिखा गया है क़ि वो सारे केसों का निर्णय अंग्रेजों की न्याय पद्धति के आदर्शों के आधार पर ही होगा, भारतीय न्याय पद्धति का आदर्श उसमें लागू नहीं होगा. कितनी लज्जास्पद स्थिति है ये क़ि हमें अभी भी अंग्रेजों का ही अनुसरण करना होगा.

१३) भारत में स्वतंत्रता की लड़ाई हुई तो वो ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरूद्ध था और संधि की गणनानुसार ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत छोड़ कर जाना था और वो चली भी गयी परन्तु इस संधि में ये भी है क़ि ईस्ट इंडिया कम्पनी तो जाएगी भारत से पर शेष 126 विदेशी कंपनियां भारत में रहेंगी और भारत सरकार उनको पूरा संरक्षण देगी और उसी का परिणाम है क़ि ब्रुक बोंड, लिप्टन, बाटा, हिंदुस्तान लीवर (अब हिंदुस्तान यूनिलीवर) जैसी 126 कंपनियां स्वतंत्रता के पश्चात भी इस देश में बची रह गयी और लूटती रही और आज भी वो सब लूट रही है.|

१४) अंग्रेजी का स्थान अंग्रेजों के जाने के बाद वैसे ही रहेगा भारत में जैसा क़ि अभी (1946 में) है और ये भी इसी संधि का भाग है. आप देखिये क़ि हमारे देश में, संसद में, न्यायपालिका में, कार्यालयों में हर कहीं अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी है जब क़ि इस देश में 99% लोगों को अंग्रेजी नहीं आती है तथा उन 1% लोगों को देखो क़ि उन्हें मालूम ही नहीं रहता है क़ि उनको पढना क्या है और uno में जा कर भारत के स्थान पर पुर्तगाल का भाषण पढ़ जाते हैं |

१५) आप में से बहुत लोगों को स्मरण होगा क़ि हमारे देश में स्वतंत्रता के 50 साल के पश्चात तक संसद में वार्षिक बजट संध्या को 5:00 बजे पेश किया जाता था | जानते है क्यों ? क्योंकि जब हमारे देश में संध्या के 5:00 बजते हैं तो लन्दन में सुबह के 11:30 बजते हैं और अंग्रेज अपनी सुविधा से उनको सुन सके और उस बजट की समीक्षा कर सके | इतनी दासता में रहा है ये देश. ये भी इसी संधि का भाग है |

१६) 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ तो अंग्रेजों ने भारत में राशन कार्ड का सिस्टम बनाया क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को अनाज की आवश्यकता थी और वे ये अनाज भारत से चाहते थे. इसीलिए उन्होंने यहाँ जनवितरण प्रणाली और राशन कार्ड प्रारंभ किया. वो प्रणाली आज भी लागू है इस देश में क्योंकि वो इस संधि में है और इस राशन कार्ड को पहचान पत्र के रूप में इस्तेमाल उसी समय प्रारंभ किया गया और वो आज भी जारी है. जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें ही वोट देने का अधिकार होता था. आज भी देखिये राशन कार्ड ही मुख्य पहचान पत्र है इस देश में.

१७) अंग्रेजों के आने के पहले इस देश में गायों को काटने का कोई कत्लखाना नहीं था. मुगलों के समय तो ये कानून था क़ि कोई यदि गाय को काट दे तो उसका हाथ काट दिया जाता था. अंग्रेज यहाँ आये तो उन्होंने पहली बार कलकत्ता में गाय काटने का कत्लखाना प्रारंभ किया, पहला मदिरालय प्रारंभ किया, पहला वेश्यालय प्रारंभ किया और इस देश में जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी वहां वहां वेश्याघर बनाये गए, वहां वहां मदिरालय खुला, वहां वहां गाय के काटने के लिए कत्लखाना खुला | ऐसे पूरे देश में 355 छावनियां थी उन अंग्रेजों की. अब ये सब क्यों बनाये गए थे ये आप सब सरलता से समझ सकते हैं | अंग्रेजों के जाने के पश्चात ये सब समाप्त हो जाना चाहिए था परन्तु नहीं हुआ क्योंक़ि ये भी इसी संधि में है. 
१८) हमारे देश में जो संसदीय लोकतंत्र है वो वास्तव में अंग्रेजों का वेस्टमिन्स्टर सिस्टम है | ये अंग्रेजो के इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली है. ये कहीं से भी न संसदीय है और ना ही लोकतान्त्रिक है. परन्तु इस देश में वही सिस्टम है क्योंकि वो इस संधि में कहा गया है.


ऐसी हजारों शर्तें हैं. मैंने अभी जितना आवश्यक समझा उतना लिखा है. सारांश यही है क़ि इस देश में जो कुछ भी अभी चल रहा है वो सब अंग्रेजों का है हमारा कुछ नहीं है.| अब आप के मन में ये प्रश्न उठ रहा होगा क़ि पहले के राजाओं को तो अंग्रेजी नहीं आती थी तो वो भयावह संधियों (षडयंत्र) के जाल में फँस कर अपना राज्य गवां बैठे परन्तु स्वतंत्रता के समय वाले नेताओं को तो अच्छी अंग्रेजी आती थी फिर वो कैसे इन संधियों के जाल में फँस गए. इसका कारण थोडा भिन्न है क्योंकि स्वतंत्रता के समय वाले नेता अंग्रेजों को अपना आदर्श मानते थे इसलिए उन्होंने जानबूझ कर ये संधि की थी. वो मानते थे क़ि अंग्रेजों से बढियां कोई नहीं है इस संसार में. भारत की स्वतंत्रता के समय के नेताओं के भाषण आप पढेंगे तो आप पाएंगे क़ि वो केवल देखने में ही भारतीय थे पर मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे. वे कहते थे क़ि सारा आदर्श है तो अंग्रेजों में, आदर्श शिक्षा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श अर्थव्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श चिकित्सा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कृषि व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श न्याय व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कानून व्यवस्था है तो अंग्रेजों की | हमारे स्वतंत्रता के समय के नेताओं को अंग्रेजों से बड़ा आदर्श कोई दिखता नहीं था और वे ताल ठोक ठोक कर कहते थे क़ि हमें भारत अंग्रेजों जैसा बनाना है | अंग्रेज हमें जिस मार्ग पर चलाएंगे उसी मार्ग पर हम चलेंगे. इसीलिए वे ऐसी मूर्खतापूर्ण संधियों में फंसे. यदि आप अभी तक उन्हें देशभक्त मान रहे थे तो ये भ्रम मन से निकाल दीजिये तथा आप यदि समझ रहे हैं क़ि वो abc पार्टी के नेता बढ़िया नहीं थे अथवा हैं तो xyz पार्टी के नेता भी दूध के धुले नहीं हैं. आप किसी को भी बढ़िया मत समझिएगा क्योंक़ि स्वतंत्रता के पश्चात के इन 64 सालों में सब ने चाहे वो राष्ट्रीय पार्टी हो अथवा प्रादेशिक पार्टी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का स्वाद तो सबो ने चखा ही है | 

तो भारत की दासता जो अंग्रेजों के ज़माने में थी, अंग्रेजों के जाने के 64 वर्ष के पश्चात आज 2011 में जस क़ि तस है क्योंकि हमने संधि कर रखी है और देश को इन भयानक संधियों के मकड़जाल में फंसा रखा है. बहुत दुःख होता है अपने देश के बारे जानकार और सोच कर. मैं ये सब कोई प्रसन्नता से नहीं लिखता हूँ ये मेरे मन की पीड़ा है जो मैं आप लोगों से शेयर करता हूँ | 

ये सब बदलना आवश्यक है परन्तु हमें सरकार नहीं व्यवस्था में परिवर्तन करना होगा एवं आप यदि ये सोच रहे हैं क़ि कोई 'अवतार' आएगा और सब बदल देगा तो आप भ्रम में जी रहे हैं. कोई शिवजी, कोई हनुमान जी, कोई राम जी, कोई कृष्ण जी नहीं आने वाले. आपको और हमको ही ये सारे अवतार में आना होगा, हमें ही सड़कों पर उतरना होगा और इस व्यवस्था को जड़ मूल से समाप्त करना होगा | भगवान भी उसी की सहायता करते हैं जो अपनी सहायता स्वयं करता है | 

इतने लम्बे लेख को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद् .मेरा उद्देश्य बस इतना ही है कि ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये. |

स्वदेशी के प्रखर प्रवक्ता, राष्ट्रीय चिंतक - भाई राजीव दीक्षित