आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

बुधवार, 26 जनवरी 2011

भारतीय संविधान उधार का थैला है

भारत के संविधान निर्माता जनता के समक्ष कोई मौलिक या अभूतपूर्व संविधान प्रस्तुत नहीं करना चाहते थे, उनका उद्देश्य तो एक व्यावहारिक और अच्छा संविधान बनाना था इसलिए उन्होंने संसार के प्रमुख और सफल संविधानों का गहन अध्ययन किया और उनसे भारतीय परिस्थितियों के लिए लाभदायक तत्वों को बिना हिचक स्वीकार कर लिया ! फलस्वरूप भारतीय संविधान संसार के विभिन्न संविधानों का सम्मिश्रण हो गया !

भारतीय संविधान पर प्रभाव डालने वाले प्रमुख संविधान -- 

सर्वबंधनों और दुखों के मूल कारण

महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के अनुसार सर्वबंधनों और दुखों के मूल कारण पांच क्लेश हैं - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश !


अब इन कारणों को समझते हैं -

अविद्या - अनित्य में नित्य, अशुद्ध में शुद्ध, दुःख में सुख, अनात्म में आत्म समझना अविद्या है ! इस अविद्या रुपी क्षेत्र में ही अन्य चारों क्लेशों का जन्म होता है !

अस्मिता - चित्त जड़ रूप है, और चेतन पुरूष चिति कहा जाता है ! इस अविद्या के कारण जड़ चित्त और  चेतन पुरुष चिति में भेद नहीं रहता ! यह अविद्या से उत्पन्न हुआ चित्त और चिति में अविवेक अस्मिता क्लेश कहलाता है !

राग - चित्त और चिति में विवेक न रहने से जड़ तत्त्व में (सांसारिक भौतिक पदार्थों में) सुख की वासना उत्पन्न होती है ! अस्मिता क्लेश से उत्पन्न चित्त में सुख की इस वासना (इच्छा) का नाम राग है !


द्वेष - इस राग से सुख में विघ्नं पडने पर दुःख के संस्कार उत्पन्न होते हैं ! राग से उत्पन्न हुए दुःख के संस्कारों का नाम द्वेष है !


अभिनिवेश - दुःख पाने के भय से भौतिक शरीर को बचाए रखने की वासना उत्पन्न होती है, इसका नाम अभिनिवेश है !!


क्लेशों से कर्म की वासनाएं उतपन्न होती हैं ! कर्म -वासनाओं से जन्म रुपी वृक्ष उत्तपन्न होता है ! उस वृक्ष में जाति, आयु और भोग रुपी तीन प्रकार के फल लगते हैं ! इन तीनों फलों में सुख-दुःख रुपी दो प्रकार का स्वाद होता है ! 


जो पुण्य-कर्म अर्थात हिंसारहित दूसरे के हितार्थ कल्याणार्थ कर्म किये जाते हैं, उनसे जाति, आयु और भोग में सुख मिलता है और जो पाप - कर्म अर्थात हिंसात्मक दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए कर्म किये जाते हैं, उनसे जाति, आयु और भोग में दुःख पहुंचता है !


किन्तु यह सुख भी तत्ववेता की दृष्टि में दुःख रूप ही है, क्योंकि विषयों में परिणाम - दुःख, ताप दुःख और संस्कार दुःख मिला हुआ होता है, और तीनों गुणों के सदा अस्थिर रहने के कारण उनकी सुख-दुःख और मोहरूपी वृतियां भी बदलती रहती हैं ! इसीलिए सुख के पीछे दुःख के होना आवश्यक है !!!

बुधवार, 12 जनवरी 2011

जो इश्वर मुझे यहाँ रोटी नहीं दे सकता, वो मुझे स्वर्ग में अनंत सुख कैसे दे सकेगा

भारत को ऊपर उठाया जाना हैं ! गरीबों की भूख मिटाई जानी हैं ! शिक्षा का प्रसार किया जाना है ! पंडे पुरोहितो और धर्म के ठेकेदारों को हटाया जाना है ! हमने पंडे पुरोहित और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहिए ! हमें सामाजिक आतंक नहीं चाहिए !

हमें तो हरेक के लिए रोटी , हरेक के लिए काम की अधिक सुविधाएँ चाहिए !

जनता के आध्यात्मिक उत्थान की एक ही शर्त है, आर्थिक और राजनीतिक पुनर्निर्माण !

भूखे हमसे रोटी मंगाते हैं और हम उन्हें लोक परलोक में उलझा देते हैं, कहा जाता है कि इस लोक में दुःख सहोगे तो परलोक में सुख भोगोगे, उन्हें कर्म और भाग्य के एक ऐसे सिद्धांत में उलझा दिया जाता है, जिससे बाहर आने का को मार्ग ही नहीं है !