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रविवार, 20 मार्च 2011

होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से


आत्मज्ञान से, होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से 
छिन छिन पल पल घड़ि घड़ि होरी निशिदिन आठों जाम से 
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से ।। (२)


पंडित खेलै पोथी पत्रा से, मुल्ला किताब कुरान से,
जोगी खेले जोग जुगत से, अभिमानी खेलै अभिमान से ।
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से 

छिन छिन पल पल घड़ि घड़ि होरी निशिदिन आठों जाम से 
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से ।। (२)



कामी खेलै कामिनि के संग, लोभी खेलत दाम से,
पतिव्रता खेलै अपने पति संग, वैश्या सकल जहान से ।

होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से 
छिन छिन पल पल घड़ि घड़ि होरी निशिदिन आठों जाम से 
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से ।। (२)



अति प्रचंड तेज माया को, तकि तकि मारत बान से,
कोटिन माहि बचे कोई बिरला, कहे कबीर गुरु ग्यान से ।

होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से 
छिन छिन पल पल घड़ि घड़ि होरी निशिदिन आठों जाम से 
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से ।। (२)


2 टिप्‍पणियां:

अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं