आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

शनिवार, 18 जून 2011

भारत के कानून - 1857 से लेकर 1946 तक >>> 2011 >>>?|....

भारत में 1857 के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ करता था वो अंग्रेजी सरकार का सीधा शासन नहीं था | 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में मौजूद 99% अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन-चुन के मार डाला था और 1% इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने को बचाने के लिए अपने शरीर को काला रंग लिया था | लोग इतने गुस्से में थे कि उन्हें जहाँ अंग्रेजों के होने की भनक लगती थी तो वहां पहुँच के वो उन्हें काट डालते थे | हमारे देश के इतिहास की किताबों में उस क्रांति को सिपाही विद्रोह के नाम से पढाया जाता है | Mutiny और Revolution में अंतर होता है लेकिन इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में | 1857 की गर्मी में मेरठ से शुरू हुई ये क्रांति जिसे सैनिकों ने शुरू किया था, लेकिन एक आम आदमी का आन्दोलन बन गया और इसकी आग पुरे देश में फैली और 1 सितम्बर तक पूरा देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया था | भारत अंग्रेजों और अंग्रेजी अत्याचार से पूरी तरह मुक्त हो गया था | लेकिन नवम्बर 1857 में इस देश के कुछ गद्दार रजवाड़ों ने अंग्रेजों को वापस बुलाया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित करने में हर तरह से योगदान दिया | धन बल, सैनिक बल, खुफिया जानकारी, जो भी सुविधा हो सकती थी उन्होंने दिया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित किया | और आप इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि वो रजवाड़े आज भी भारत की राजनीति में सक्रिय हैं |

शनिवार, 11 जून 2011

घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ - डॉ. हरिओम पंवार

मैं भी गीत सुना सकता हूँ शबनम के अभिनन्दन के
मै भी ताज पहन सकता हूँ नंदन वन के चन्दन के
लेकिन जब तक पगडण्डी से संसद तक कोलाहल है
तब तक केवल गीत पढूंगा जन-गण-मन के क्रंदन के

जब पंछी के पंखों पर हों पहरे बम के, गोली के
जब पिंजरे में कैद पड़े हों सुर कोयल की बोली के
जब धरती के दामन पार हों दाग लहू की होली के
कैसे कोई गीत सुना दे बिंदिया, कुमकुम, रोली के

मैं झोपड़ियों का चारण हूँ आँसू गाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

राजनीत में लोह्पुरुष जैसा सरदार नही मिलता
लाल बहादुर जैसा कोई किरदार नही मिलता
ऐरे गैरे नत्थू खैरे तंत्री बन कर बैठे हैं
जिनको जेलों में होना था मंत्री बन कर  बैठे  हैं


लोक  तंत्र  का  मंदिर  भी  लाचार  बना  कर  डाल दिया
कोई  मछली बिकने का  बाजार  बना  कर  दाल  दिया
अब  जनता  को  संसद  भी  परपंच  दिखाई  देती  है
नोटंकी  करने  का  फिर  मंच  दिखाई  देती  है
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कहाँ बनेगें मंदिर-मस्जिद कहाँ बनेगी रजधानी
मण्डल और कमण्डल ने पी डाला आँखों का पानी
प्यार सिखाने वाले बस्ते मजहब के स्कूल गये
इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गये

कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल चलें
सोन -चिरैया सूली पर है पंछी गाना भूल चले
आँख खुली तो माँ का दामन नाखूनों से त्रस्त मिला
जिसको जिम्मेदारी सौंपी घर भरने में व्यस्त मिला

क्या ये ही सपना देखा था भगतसिंह की फाँसी ने
जागो राजघाट के गाँधी तुम्हे जगाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

एक नया मजहब जन्मा है पूजाघर बदनाम हुए
दंगे कत्लेआम हुए जितने मजहब के नाम हुए
मोक्ष-कामना झांक रही है सिंहासन के दर्पण में
सन्यासी के चिमटे हैं अब संसद के आलिंगन में

तूफानी बदल छाये हैं नारों के बहकावों के
हमने अपने इष्ट बना डाले हैं चिन्ह चुनावों के
ऐसी आपा धापी जागी सिंहासन को पाने की
मजहब पगडण्डी कर डाली राजमहल में जाने की

जो पूजा के फूल बेच दें खुले आम बाजारों में
मैं ऐसे ठेकेदारों के नाम बताने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

कोई कलमकार के सर पर तलवारें लटकाता है
कोई बन्दे मातरम के गाने पर नाक चढ़ाता है
कोई-कोई ताजमहल का सौदा करने लगता है
कोई गंगा-यमुना अपने घर में भरने लगता है

कोई तिरंगे झण्डे को फाड़े-फूंके आजादी है
कोई गाँधी जी को गाली देने का अपराधी है
कोई चाकू घोंप रहा है संविधान के सीने में
कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में
कोई ढाँचे का गिरना यू. एन. ओ. में ले जाता है
कोई भारत माँ को डायन की गाली दे जाता है

लेकिन सौ गाली होते ही शिशुपाल कट जाते हैं
तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

जब कोयल की डोली गिद्धों के घर में आ जाती है
तो बगुला भगतों की टोली हंसों को खा जाती है
इनको कोई सजा नहीं है दिल्ली के कानूनों में
न जाने कितनी ताकत है हर्षद के नाखूनों में

जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है
तब माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है
जब-जब भी जयचंदों का अभिनन्दन होने लगता है
तब-तब साँपों के बंधन में चन्दन रोने लगता है

जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते हैं
तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते हैं
सिंहों को 'म्याऊं' कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है
बिल्ली में क्या ताकत होती कायरता दिल्ली में है

कहते हैं यदि सच बोलो तो प्राण गँवाने पड़ते हैं
मैं भी सच्चाई गा-गाकर शीश कटाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

'भय बिन होय न प्रीत गुसांई' - रामायण सिखलाती है
राम-धनुष के बल पर ही तो सीता लंका से आती है
जब सिंहों की राजसभा में गीदड़ गाने लगते हैं
तो हाथी के मुँह के गन्ने चूहे खाने लगते हैं

केवल रावलपिंडी पर मत थोपो अपने पापों को
दूध पिलाना बंद करो अब आस्तीन के साँपों को
अपने सिक्के खोटे हों तो गैरों की बन आती है
और कला की नगरी मुंबई लोहू में सन जाती है

राजमहल के सारे दर्पण मैले-मैले लगते हैं
इनके ख़ूनी पंजे दरबारों तक फैले लगते हैं
इन सब षड्यंत्रों से परदा उठना बहुत जरुरी है
पहले घर के गद्दारों का मिटना बहुत जरुरी है

पकड़ गर्दनें उनको खींचों बाहर खुले उजाले में
चाहे कातिल सात समंदर पार छुपा हो ताले में
ऊधम सिंह अब भी जीवित है ये समझाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

डॉ. हरिओम पंवार
Dedicated to Bharat Swabhiman Andolan

मंगलवार, 7 जून 2011

तानाशाही सरकार की विनाश काले विपरीत बुद्धि

रामलीला मैदान में अनशन कर रहे बाबा रामदेव और उनके हजारों अनुयायियों के साथ दिल्ली पुलिस ने शनिवार को आधी रात के बाद जैसा सुलूक किया, वह बर्बर तो है ही, उससे तानाशाही की भी बू आती है। दूर-दराज से आए लोगों, महिलाओं और बच्चों पर लाठियां चलाने वाली सरकार ने बाद में जहां अपनी इस अमानवीयता को जायज ठहराया, वहीं दिल्ली पुलिस ने तर्क गढ़ा कि बाबा की जान को खतरा था, इसलिए उन्हें वहां से हटाया गया! फिर वहां लाठियां भांजती और आंसू गैस छोड़ती हजारों पुलिस क्यों थी, इसका जवाब सरकार के पास नहीं है।

बाबा रामदेव और उनके समर्थक अचानक रामलीला मैदान में इकट्ठा नहीं हो गए थे। भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ आंदोलन की बात बाबा ने बहुत पहले सरकार को बताई थी। उनमें आपसी संवाद और सहमति भी हुई थी, जो बाद में असहमति में बदल गई। लेकिन उसकी प्रतिक्रिया इतनी भी अमानवीय नहीं होनी चाहिए थी। मौजूदा प्रसंग में सरकार ने लगातार गलतियां कीं। पहले उसके चार वरिष्ठ मंत्री बाबा को मनाने एयरपोर्ट पहुंच गए, फिर अचानक उन्होंने उनकी चिट्ठी सार्वजनिक कर दी, और आखिर में तो अति ही हो गई। सरकार के तानाशाही रवैये से स्पष्ट है कि वह योगगुरु की ज्यादातर शर्तें मान लेने का सिर्फ नाटक कर रही थी। हर रोज भ्रष्टाचार के एक नए खुलासे से बेपरदा होती सरकार अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद बाबा रामदेव के अनशन को किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देना चाहती थी।

इसीलिए बाबा को मनाने की कोशिश विफल हो जाने के बाद उसने इस आंदोलन को जबरन दबाने की ठान ली थी। अब पता यह चला है कि दो केंद्रीय मंत्रियों के साथ एक होटल में बाबा की मुलाकात के दौरान भी भारी संख्या में पुलिस मौजूद थी। एक मंत्री ने बाबा को चेतावनीदी थी कि अगर उनके मंच पर अन्ना हजारे आए, तो सरकार उनसे कोई बात नहीं करेगी। यानी एक के बाद एक घोटाले इस सरकार को शर्मिंदा नहीं करते, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर उसकी परेशानी बढ़ जाती है। इस घटना के बाद सिविल सोसाइटी ने आज होने वाली जन लोकपाल विधेयक की ड्राफ्ंिटग कमेटी की बैठक में भाग न लेने का फैसला तो किया ही है, अन्ना हजारे और रामदेव, दोनों ने आंदोलन आगे जारी रखने की बात कही है।

वैसे तो तमाम राजनीतिक दलों और संगठनों ने इस बर्बरतापूर्ण कार्रवाई का तीखा विरोध किया है, लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि यह मुद्दा अब यूपीए के खिलाफ एक व्यापक गठजोड़ का अवसर भी बनेगा। यह बर्बरता खुद सरकार के लिए भी बहुत महंगी पड़ेगी।

देश को यह बताया जाना चाहिए कि यदि केंद्र सरकार को बाबा की वादाखिलाफी पर गुस्सा आ गया तो उसे ऐसा ही गुस्सा अपने पर क्यों नहीं आता

देश को यह बताया जाना चाहिए कि जो सरकार पहले बाबा रामदेव के समक्ष नतमस्तक होती है और यहां तक कि उनकी चिरौरी करती नजर आती है वही कुछ घंटे बाद उनके और साथ ही उनके तमाम समर्थकों के साथ भेड़-बकरियों जैसा व्यवहार क्यों करती है और वह भी रात के अंधेरे में? 
               चार जून की रात केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थकों-यहां तक कि महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गो के साथ जो हुआ उसे बर्बरता के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। केंद्र सरकार ने निहत्थे लोगों के साथ पशुवत व्यवहार कर खुद को शर्मसार करने के साथ ही देश को यह अवसर दिया है कि वह उसकी निंदा-भ‌र्त्सना करने के लिए आगे आए। रामलीला मैदान में सोते हुए लोगों पर पुलिसिया कार्रवाई आपातकाल की याद दिलाने के साथ ही ढुलमुल और दिन-प्रतिदिन आम जनता का विश्वास खोती जा रही मनमोहन सिंह सरकार के अहंकार को भी रेखांकित करती है। ऐसा लगता है कि चौतरफा हमलों से घिरी केंद्र सरकार उचित-अनुचित में भेद करना भी भूल गई है। 

यदि सरकार को बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के साथ ऐसा करना था तो फिर उसने उन्हें रामलीला मैदान में शिविर लगाने और सत्याग्रह करने की इजाजत ही क्यों दी? केंद्र सरकार की मानें तो रामदेव के खिलाफ जबरदस्ती करने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि उन्होंने समझौते का उल्लंघन किया। इस संदर्भ में बाबा रामदेव के एक सहयोगी की चिट्ठी भी दिखाई जा रही है। यदि चिट्ठी को सही भी मान लें तो क्या उसका इस्तेमाल बाबा को नीचा दिखाने के इरादे से करना सही था? यदि यह भी मान लें कि बाबा रामदेव ने वादाखिलाफी की तो क्या उसके प्रतिकार का वही तरीका उचित था जो दिल्ली पुलिस ने अपनाया? 
यदि केंद्र सरकार को बाबा की वादाखिलाफी पर गुस्सा आ गया तो उसे ऐसा ही गुस्सा अपने पर क्यों नहीं आता? क्या यह तथ्य नहीं कि 2004 में मनमोहन सिंह ने सत्ता संभालते ही यह वादा किया था कि वह लोकपाल विधेयक लेकर आएंगे? यह तो सबके संज्ञान में है कि पिछले वर्ष देश को सगर्व बताया गया था कि केंद्र सरकार कुछ ही महीनों में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के लिए विधेयक लेकर आएगी। आखिर अपनी इन वादाखिलाफियों पर सरकार का ध्यान क्यों नहीं जाता? सच तो यह है कि केंद्र सरकार अभी भी वादाखिलाफी करने पर तुली हुई है। 
अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद उसने यह भरोसा दिलाया था कि वह मजबूत लोकपाल विधेयक तैयार करने के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन वह न केवल अपने कदम पीछे खींच रही है, बल्कि ऐसे पैंतरे चला रही है जिससे यह विधेयक तैयार ही न किया जा सके। आखिर यह कैसी सरकार है जो जिस जनता द्वारा चुनी गई है उसी की आकांक्षाओं को मिट्टी में मिलाने का काम कर रही है?
संप्रग सरकार कोई भी काम ढंग से नहीं कर पा रही है और अब तो स्थिति इतनी दयनीय है कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता की ओर से ऐसा आचरण प्रदर्शित किया जा रहा है जैसे दाएं हाथ को यह मालूम न हो कि बायां हाथ क्या कर रहा है? केंद्रीय सत्ता ने अपने हाथों अपनी दुर्गति करा ली है ।