आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

मंगलवार, 7 जून 2011

देश को यह बताया जाना चाहिए कि यदि केंद्र सरकार को बाबा की वादाखिलाफी पर गुस्सा आ गया तो उसे ऐसा ही गुस्सा अपने पर क्यों नहीं आता

देश को यह बताया जाना चाहिए कि जो सरकार पहले बाबा रामदेव के समक्ष नतमस्तक होती है और यहां तक कि उनकी चिरौरी करती नजर आती है वही कुछ घंटे बाद उनके और साथ ही उनके तमाम समर्थकों के साथ भेड़-बकरियों जैसा व्यवहार क्यों करती है और वह भी रात के अंधेरे में? 
               चार जून की रात केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थकों-यहां तक कि महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गो के साथ जो हुआ उसे बर्बरता के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। केंद्र सरकार ने निहत्थे लोगों के साथ पशुवत व्यवहार कर खुद को शर्मसार करने के साथ ही देश को यह अवसर दिया है कि वह उसकी निंदा-भ‌र्त्सना करने के लिए आगे आए। रामलीला मैदान में सोते हुए लोगों पर पुलिसिया कार्रवाई आपातकाल की याद दिलाने के साथ ही ढुलमुल और दिन-प्रतिदिन आम जनता का विश्वास खोती जा रही मनमोहन सिंह सरकार के अहंकार को भी रेखांकित करती है। ऐसा लगता है कि चौतरफा हमलों से घिरी केंद्र सरकार उचित-अनुचित में भेद करना भी भूल गई है। 

यदि सरकार को बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के साथ ऐसा करना था तो फिर उसने उन्हें रामलीला मैदान में शिविर लगाने और सत्याग्रह करने की इजाजत ही क्यों दी? केंद्र सरकार की मानें तो रामदेव के खिलाफ जबरदस्ती करने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि उन्होंने समझौते का उल्लंघन किया। इस संदर्भ में बाबा रामदेव के एक सहयोगी की चिट्ठी भी दिखाई जा रही है। यदि चिट्ठी को सही भी मान लें तो क्या उसका इस्तेमाल बाबा को नीचा दिखाने के इरादे से करना सही था? यदि यह भी मान लें कि बाबा रामदेव ने वादाखिलाफी की तो क्या उसके प्रतिकार का वही तरीका उचित था जो दिल्ली पुलिस ने अपनाया? 
यदि केंद्र सरकार को बाबा की वादाखिलाफी पर गुस्सा आ गया तो उसे ऐसा ही गुस्सा अपने पर क्यों नहीं आता? क्या यह तथ्य नहीं कि 2004 में मनमोहन सिंह ने सत्ता संभालते ही यह वादा किया था कि वह लोकपाल विधेयक लेकर आएंगे? यह तो सबके संज्ञान में है कि पिछले वर्ष देश को सगर्व बताया गया था कि केंद्र सरकार कुछ ही महीनों में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के लिए विधेयक लेकर आएगी। आखिर अपनी इन वादाखिलाफियों पर सरकार का ध्यान क्यों नहीं जाता? सच तो यह है कि केंद्र सरकार अभी भी वादाखिलाफी करने पर तुली हुई है। 
अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद उसने यह भरोसा दिलाया था कि वह मजबूत लोकपाल विधेयक तैयार करने के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन वह न केवल अपने कदम पीछे खींच रही है, बल्कि ऐसे पैंतरे चला रही है जिससे यह विधेयक तैयार ही न किया जा सके। आखिर यह कैसी सरकार है जो जिस जनता द्वारा चुनी गई है उसी की आकांक्षाओं को मिट्टी में मिलाने का काम कर रही है?
संप्रग सरकार कोई भी काम ढंग से नहीं कर पा रही है और अब तो स्थिति इतनी दयनीय है कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता की ओर से ऐसा आचरण प्रदर्शित किया जा रहा है जैसे दाएं हाथ को यह मालूम न हो कि बायां हाथ क्या कर रहा है? केंद्रीय सत्ता ने अपने हाथों अपनी दुर्गति करा ली है ।

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं