आध्यात्मिक राष्ट्रवाद सदस्य

सोमवार, 25 जुलाई 2011

जब से हमारा पेट भरने लगा है यारों, हमें दुनिया में कोई रंक नहीं दिखता - सत्यपाल सत्यम


चाँद से उतरती है चांदनी तो दिखती है, 
चाँद पे लगा हुआ कलंक नहीं दिखता,  - 2
सांप के डसे  का विष फैलता तो दिखता है,
आदमी के डसने का डंक नहीं दिखता, 
जब से हमारा पेट भरने लगा है यारों, 
हमें दुनिया में कोई रंक नहीं दिखता - हमें कोई रंक नहीं दिखता !!

घर में गरीब के अँधेरा नहीं दिखता है,
ऊँचे महलों के वो उजाले नहीं दीखते 
बड़े-बड़े लोगों की महानता तो दिखती है, 
सभ्य आदमी के कर्म काले नहीं दिखते !1

छोटे से व्यवसाय में करोडपति दीखते हैं, 
गुपचुप होते ये घोटाले नहीं दिखते, 
सत्ता हथियाने को बड़े ही मुद्दे दिखते हैं, 
उड़ीसा  में भूखे मरने वाले नहीं दिखते !1

कागज के फूल यहाँ असली से दिखते हैं, 
पतझड़ में झडा चमन नहीं दिखता,
कारखानों से धरा पे सुविधाएँ दिखती हैं, 
धुंआ-धुंआ होता ये गगन नहीं दिखता, 
हमको विकास की ऊंचाइया तो दिखती हैं,
छोपड़ी 
डकारता भवन नहीं दिखता,
जब से विदेशियों ने मन मेरा मोह लिया,
मुझे मेरा जलता वतन नहीं दीखता !!!1

अब अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के बीच,
स्वयं को लगे हैं लोग अनुकूल ढालने, 
अनुयायी लोहिया के लगें हैं, अब दलदल से पाँव को निकालने,
नोटों की खनक देख के बहक गए,
जो चले थे देश की कमान को संभालने, 
बापू तेरे बन्दर शरारती बहुत हुए,
एक दूजे की लगें हैं टोपियाँ उछालने !!!!!


पतंजलि योगपीठ के कवि सम्मलेन में  - सत्यपाल सत्यम  की कविता के कुछ अंश - 
यदि आप सत्यपाल सत्यम की बुलंद आवाज़ में यह कविता सुनना चाहें तो एक टिप्पड़ी द्वारा मुझे सूचित करें !

3 टिप्‍पणियां:

  1. जब से विदेशियों ने मन मेरा मोह लिया,
    मुझे मेरा जलता वतन नहीं दीखता !!!1

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अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियां और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं